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एक पद्य कथा : अभिमानी का सिर नीचा

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पद्य कथा
यहां एक मौलिक और अप्रकाशित पद्य कथा प्रस्तुत हैं...
 
एक संत के पास एक दिन,
एक आदमी आया। 
बोला पानी पर चलने का,
मंत्र सीख मैं आया। 
 
दौड़ लगाकर पानी पर मैं,
नदी पार जाता हूं। 
भरी बाढ़ में जल पर चलकर,
वापस आ जाता हूं। 
 
संत खुश हुए बोले बच्चे,
ज्ञान ठीक पाया है। 
पर बतलाओ इस पर कितना,
समय किया जाया है। 
 
कहा पुरुष ने बीस वर्ष में,
हुनर सीख मैं पाया। 
की वन में एकांत साधना,
तब मंजिल पा पाया। 
 
बोले संत, रुप ए दस देकर,
नदी पार जाता हूं। 
इतने ही नाविक को दे फिर ,
वापस आ जाता हूं। 
 
बीस रुपए के लिए व्यर्थ ही,
इतने वर्ष गंवाए। 
समय गंवाकर बोलो इतना,
जग को क्या दे पाए। 
 
बातें सुनकर प्रवर संत की,
पुरुष बहुत शरमाया। 
अभिमानी सिर नीचा करके,
घर को वापस आया। 
 

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