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कहानी : आदमखोर तेंदुआ

राजेश मेहरा
आज फिर तेंदुए ने एक आदमी पर हमला किया था। आदमी किसी तरह बच तो गया लेकिन उसके जख्म इतने गहरे थे कि उसको ठीक होने में अब समय लगेगा। इस तेंदुए का हमला अब गांव वालों पर बढ़ने लगा था। लोग अब घबरा गए थे और शाम होते-होते वो अपने घरों में कैद हो जाते थे।


 
 
अब गांव वालों ने तेंदुए के डर के कारण अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया था। पूरा गांव डर के माहौल में जी रहा था। उन्होंने डर के कारण अपने खेतों पर भी जाना बंद कर दिया था, क्योंकि तेंदुआ ज्यादातर वहीं पर घात लगाकर हमला करता था। खेतों पर न जाने के कारण अब उनको भूखों मरने की नौबत आ गई थी। 
 
गांव वालों ने प्रशासन से भी मदद मांगी थी लेकिन उन्होंने भी उनके पास शिकारी न होने का हवाला दिया। गांव वाले केवल भगवान के सहारे अपना जीवन जी रहे थे। उधर तेंदुए ने 5 गांव वालों को शिकार बना लिया था और वो खतरनाक आदमखोर हो गया था।

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शाम के समय थोड़ी बूंदा-बांदी हो रही थी। राजू और उसके दादाजी ने कमरे में ठंड से बचने के लिए आग जला रखी थी। पूरे गांव में सन्नाटा था। सब लोग अपने-अपने घरों में बंद हो गए थे। 
 
राजू अपने दादाजी से बोला- दादाजी, इस आदमखोर तेंदुए का कुछ उपाय करना पड़ेगा। सारा गांव उसके डर से सहमा हुआ है और उनको रोजमर्रा के कामों को करने में बहुत कठिनाई हो रही है। बच्चों की पढ़ाई का भी नुकसान हो रहा है।
 
दादाजी ने राजू से कहा- वो उस तेंदुए से अकेले नहीं लड़ सकता। 
 
इतना सुन राजू अपने घर से सटे अपने दोस्त बीरू के घर पहुंचा। जाने से पहले दादाजी ने उसे सतर्क रहने को कहा।

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बीरू के घर पर राजू ने उससे इस तेंदुए से छुटकारा पाने पर बात की। बीरू भी चाहता था कि तेंदुए से गांव वालों की जान बचाई जाए। उन दोनों ने कुछ निर्णय लिया और रात के समय उस तेंदुए से निपटने के बारे में सोचा।
 
राजू अपने घर आया और उसने दादाजी से छुपाकर कुछ सामान इकट्ठा किया। जब दादाजी सो गए तो वो धीरे से उठा और सामान लेकर बीरू के घर के पीछे पहुंचा। बीरू पहले ही उसका इंतजार कर रहा था। 
 
दोनों ने राजू द्वारा लाया गया सेंट लगा लिया जिससे कि तेंदुआ पास होने पर उनकी गंध न पा सके। उसके बाद दोनों जंगल की तरफ चल दिए। हल्की बारिश अभी भी थी। चांद बादलों से कभी निकलता और कभी छुप रहा था। 
 
उन्होंने सुना था कि उनके गांव के बाहर जो पेड़ों का झुरमुट था, तेंदुआ ज्यादातर वहीं मिलता था इसलिए वो उसी जगह से कीचड़ में तेंदुए के पैरों के निशान से उसका पीछा कर रहे थे। 
 
पीछा करते-करते वो लोग एक गुफा के मुहाने पर पहुंचे। वहां तेंदुए के पैरों के निशान खत्म हो गए थे। देखने में गुफा बहूत बड़ी थी लेकिन उसका मुंह इतना छोटा था कि तेंदुआ बड़ी मुश्किल से उसके अंदर आ-जा सके। अब उन्हें विश्वास था कि तेंदुआ इसी गुफा में है। उन्हें उसकी गुर्राहट और कुछ चबाने की आवाजें आ रही थीं। ऐसा लगता था कि जैसे वो किसी जानवर को खा रहा हो।
 
तेंदुए को उनकी मनुष्य होने की गंध नहीं मिल रही थी, क्योंकि उन्होंने बहुत सारा सेंट लगाया था। राजू और बीरू उसकी आवाज से घबरा रहे थे लेकिन हिम्मत करके उन्होंने अपने साथ लाई एक बड़ी घंटी को एक इलास्टिक की रस्सी में पिरोया और उसे गुफा के दरवाजे पर इस तरह टांग दिया कि यदि तेंदुआ निकले तो वो उसकी गर्दन में फंस जाए। उसके बाद वे दोनों पास के एक पेड़ पर चढ़ गए। उन्हें अब तेंदुए के बाहर निकलने का इंतजार था।
 
थोड़े इंतजार के बाद जैसे ही वो गुफा से निकला तो इलास्टिक घंटी के साथ उसकी गर्दन में फंस गई। अब वो जैसे ही चलता, घंटी जोर-जोर से बजती थी और उसको बजता देख वो घबराकर इधर-उधर भागने लगता। वो जितना भागता, घंटी उतनी जोर से बजती। वो घंटी की आवाज को सुनकर सोचता कि कोई उसे मारने आ रहा है और इसी घबराहट में वो दूर पहाड़ों की तरफ भाग गया। राजू और बीरू प्रसन्न होते हुए अपने घर आ गए।
 
उस दिन के बाद वो तेंदुआ कभी उनके गांव नहीं आया। राजू ने अपने दादा और गांव वालों को इसके बारे में बताया तो वे राजू और बीरू की बहादुरी से खुश हुए। पूरा गांव अब अपने सामान्य कार्य सुचारु रूप से करने लगा। अब उन्हें उस तेंदुए कोई डर नहीं था।
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