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पिता पर कविता : संडे जल्दी से आ जाओ, पापा से पूरे दिन मिलाओ

राकेशधर द्विवेदी
poem on father 
 
fathers day poem : पिता पर कविता
 
मैं एक छोटा बच्चा हूं

मेरे प्यारे पापा हैं
मेरी प्यारी मम्मा है
 
जब मैं आंखें खोलता हूं
पापा को घर में नहीं पाता हूं
 
मम्मी धीरे से समझाती
पापा ऑफिस चले गए
 
जब तक मैं जगता हूं
पापा वापस घर नहीं आते हैं
 
मेरे सो जाने पर
पापा थके-मांदे आ जाते हैं
 
फिर धीरे से पप्पी ले
सोने चले जाते हैं
 
न वो पिज्जा हट ले जाते हैं
न वो बर्गर खिलाते हैं
 
वीडियो गेम की कौन कहे
घुम्मी भी नहीं ले जाते हैं
 
मैं मम्मा से पूछता हूं
पापा कब मेरे संग खेलेंगे
 
मम्मा धीरे से समझाती
वो तो संडे को मिल पाएंगे
 
मैं धीरे से कहता हूं
ये पापा संडे वाले हैं
 
संडे जल्दी से आ जाओ
पापा से पूरे दिन मिलाओ
 
पिज्जा हट और मैकडोनल में
पूरे दिन पापा के साथ बिताओ। 

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