बालगीत था लिखा रघु ने, बैठ नदी के तीरे। डरते-डरते बाथरूम में गाया धीरे-धीरे। था स्वभाव का वह संकोची, बाहर कह ना पाया। भनक न पड़ जाए लोगों को, छुप-छुपकर था गाया। यही गीत, पर जब मित्रों ने, उछल-उछलकर गाया। निकले बहुत छुपे रुस्तम हों, कहकर...