Publish Date: Wed, 21 Oct 2026 (18:03 IST)
Updated Date: Thu, 22 Oct 2026 (11:47 IST)
Karva Chauth 2026: करवाचौथ व्रत कार्तिक माह की कृष्ण चतुर्थी के दिन रखा जाता है। इस बार 29 अक्टूबर गुरुवार 2026 को करवाचौथ का व्रत रखा जाएगा। महिलाएं इस व्रत को अपने पति की लंबी आयु और सेहत के साथ ही घर की सुख समृद्धि के लिए यह निर्जला व्रत रखती हैं। चांद को देखने के बाद ही यह व्रत खोला जाता है। करवाचौथ हिंदू धर्म में मनाया जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण और पवित्र त्योहार है। आखिर कैसे हुई करवाचौथ की शुरुआत? जानें इसका इतिहास और व्रत के खास नियमों के बारे में विस्तार से...
चतुर्थी तिथि प्रारंभ: 29 अक्टूबर, 2026 को 01:06 बजे।
चतुर्थी तिथि समाप्त: 29 अक्टूबर, 2026 को रात्रि 10:09 बजे।
करवाचौथ पूजा मुहूर्त: शाम 05:38 से 06:56 बजे तक।
करवाचौथ व्रत समय: सुबह 06:31 से रात्रि 08:17 बजे तक।
करवाचौथ के दिन चन्द्रोदय: रात्रि 08:17 बजे।
क्या है करवाचौथ का इतिहास?
पौराणिक कथाओं में एक जोर जहां माता पार्वती अपने पति शिवजी को पाने के लिए तप और व्रत करती है और उसमें सफल हो जाती है तो दूसरी ओर सावित्री अपने मृत पति को अपने तप के बल पर यमराज से भी छुड़ाकर ले आती है यानी स्त्री में इतनी शक्ति होती है कि वो यदि चाहे, तो कुछ भी हासिल कर सकती है। इसीलिए महिलाएं करवाचौथ के व्रत के रूप में अपने पति की लंबी उम्र के लिए एक तरह से तप करती हैं।
यह भी कहा जाता है कि करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री के नाम पर ही करवाचौथ का नाम करवाचौथ पड़ा है। कहते हैं कि करवा नाम की पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ नदी के किनारे के गांव में रहती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान कर रहा था तभी एक मगर ने उसका पैर पकड़ लिया। वह मनुष्य करवा-करवा कहकर अपनी पत्नी को पुकारने लगा। उसकी आवाज सुनकर उसकी पत्नी करवा भागी हुई आई और आकर उसने मगरमच्छ को कच्चे धागे से बांध दिया।
मगर को बांधकर वो यमराज के यहां पहुंच गई और यमराज से कहने लगी- हे भगवन! मगरमच्छ ने मेरे पति का पैर पकड़ लिया है। उस मगर को पैर पकड़ने के अपराध में आप नरक में ले जाओ। यमराज बोले, लेकिन अभी मगर की आयु शेष है। अतः मैं उसे नहीं मार सकता।
इस पर करवा बोली, अगर आप ऐसा नहीं करोगे तो मैं आपको श्राप देकर नष्ट कर दूंगी। सुनकर यमराज डर गए और उन्होंने मगरमच्छ को यमपुरी भेज दिया और करवा के पति को दीर्घायु रहने का आशीर्वाद दिया। तभी से उस महिला को करवा माता कहने लगे।
करवाचौथ पर है चांद का खास महत्व
करवाचौथ का व्रत चतुर्थी के चांद को देखकर ही खोला जाता है। हर शहर में चंद्रोदय का समय अलग-अलग होता है। इस दिन महिलाएं चंद्रमा को देखे बिना न तो कुछ खाती हैं और न ही पानी ग्रहण करती हैं। चंद्रमा का उदय होने के बाद सबसे पहले महिलाएं छलनी में से चंद्रमा को देखती हैं फिर अपने पति को, इसके बाद पति अपनी पत्नियों को लोटे में से जल पिलाकर उनका व्रत पूरा करवाते हैं।
ये हैं करवाचौथ के खास नियम
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शास्त्रों के अनुसार केवल सुहागिनें या जिनका रिश्ता तय हो गया हो वही स्त्रियां ये व्रत रख सकती हैं। पत्नी के अस्वस्थ होने की स्थिति में पति ये व्रत रख सकते हैं।
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करवाचौथ के दिन किसी भी प्रकार का क्रोध तथा गृह कलेश की सख्त मनाही है।
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करवाचौथ का व्रत सूर्योदय से पहले से प्रारंभ हो जाता है। उसके पूर्व कुछ भी खा-पी सकते हैं। उसके बाद जब तक रात्रि में चंद्रोदय नहीं हो जाता तब तक जल भी ग्रहण नहीं करते हैं। चंद्र दर्शन के पश्चात ही इस व्रत का विधि-विधान से पारण करना चाहिए। यदि कोई स्वास्थ्य समस्या है, तो जल पी सकते हैं।
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इस व्रत में मिट्टी के करवे लिए जाते हैं और उनसे पूजा की जाती है। करवाचौथ की पूजा में करवा माता के अतिरिक्त भगवान शिव, गणेश, माता पार्वती और कार्तिकेय सहित नंदी जी की भी पूजा की जाती है।
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पूजन के समय देव-प्रतिमा का मुख पश्चिम की ओर होना चाहिए तथा महिला को पूर्व की ओर मुख करके बैठना चाहिए। इस व्रत के दौरान महिलाओं को लाल या पीले वस्त्र ही पहनना चाहिए। काले रंग के वस्त्र नहीं पहनने चाहिए। इस दिन पूर्ण श्रृंगार करना चाहिए यानी सुहागिन महिलाओं को 16 श्रृंगार करना चाहिए।
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इस व्रत में कहीं सरगी खाने का रिवाज है, तो कहीं नहीं है। अत: अपनी परंपरा के अनुसार ही व्रत रखना चाहिए। सरगी व्रत के शुरू में सुबह दी जाती है। एक तरह से यह आपको व्रत के लिए दिनभर ऊर्जा देती है।