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3 सितंबर को ही मनाएं जन्माष्टमी, जानिए वेदों के अनुसार कारण...

पं. सुरेन्द्र बिल्लौरे
भारत देश त्योहारों का देश है। हमारे देश में व्रत-त्योहार का विशेष महत्व है। भगवान के जन्म उत्सव जन्माष्टमी के दिन प्रत्येक भक्त व्रत रखता है। व्रत रखने से पहले हर स्थिति पर विचार करना चाहिए, ताकि आपके द्वारा रखा हुआ व्रत फलदायी हो, अनर्थ न हो, क्योंकि बिना विचार के व्रत यदि गलत दिन किया जाए तो वह पुण्य-लाभ न देकर पाप या परेशानी दे सकता है।
 
इस वर्ष जन्माष्टमी भी सप्तमी- अष्टमी रविवार 2/9/2018 को होने से कई विद्वान अष्टमी का व्रत रविवार को कर रहे हैं, साथ ही सोमवार 3/9/2018 को अष्टमी युक्त नवमीं या ये कहें कि नवमीं युक्त अष्टमी है। इस दिन व्रत करना चाहिए, ऐसा शास्त्रों का मत है। शास्त्र मत अनुसार, अष्टमी का व्रत 3/9/2018 को ही करना चाहिए। अग्नि पुराण अनुसार-
 
वर्जनीय प्रयत्नेन सप्तमी संयुता अष्टमी।
बिना ऋक्षेण कर्तव्या नवमी संयुता अष्टमी।।

 
 
अर्थात जिस दिन सूर्योदय में सप्तमी होकर फिर अष्टमी आए और रोहिणी हो, तो उस दिन व्रत नहीं करना चाहिए। नवमीं युक्त अष्टमी को ही व्रत करना चाहिए।
 
श्रोत-पध पुराण अनुसार-
पुत्रां हन्ति पशून हन्ति हन्ति राष्ट्रम सराजकम।
हन्ति जातान जातनश्च सप्तमी षित अष्टमी।।
 
अर्थात अष्टमी यदि सप्तमी विध्दा हो और उसमे उपवास करें तो पुत्र, पशु, राज्य, राष्‍ट्र, जात, अजात, सबको नष्ट कर देती है।
 
श्रोत-स्कंद पुराण अनुसार-
पालवेधेपि विप्रेन्द्र सप्तम्यामष्टमी त्यजेत।
सुरया बिंदुन स्पृष्टम गंगांभ: कलशं यथा।।
 
अर्थात जिस प्रकार गंगा जल से भरा कलश एक बूंद मदिरा से दूषित हो जाता है, उसी प्रकार लेशमात्र सप्तमी हो तो अष्टमी व्रत दूषित हो जाता है।
 
विशेष : इन पुराणों के व्याख्यानों को दृष्टिगत रखते हुए जन्माष्टमी का व्रत 3/9/2018 सोमवार को ही रखा जाना चाहिए। 

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