Hanuman Chalisa

पयुर्षण पर्व : जैन धर्म में क्यों कहते हैं मिच्छामी दुक्कड़म्

अनिरुद्ध जोशी
श्वेतांबर समाज 8 दिन तक पर्युषण पर्व मनाते हैं जिसे 'अष्टान्हिका' कहते हैं जबकि दिगंबर 10 दिन तक मनाते हैं जिसे वे 'दसलक्षण' कहते हैं। 3 से 10 सितंबर तक श्वेतांबर और 10 सितंबर से दिगंबर समाज के 10 दिवसीय पयुर्षण पर्व की शुरुआत होगी। 10 दिन तक उपवास के साथ ही मंदिर में पूजा आराधना होगी। आओ जानते हैं कि क्यों कहा जाता है मिच्छामी दुक्कड़म्।
 
 
1. श्वेतांबर भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की पंचमी और दिगंबर भाद्रपद शुक्ल की पंचमी से चतुर्दशी तक यह पर्व मनाते हैं। इस पर्व के समापन के दौरान ही सभी एक दूसरे को मिच्छामी दुक्कड़म् या उत्तम क्षमा कहते हैं।
 
2. पर्युषण पर्व के समापन पर 'विश्व-मैत्री दिवस' अर्थात संवत्सरी पर्व मनाया जाता है। अंतिम दिन दिगंबर 'उत्तम क्षमा' तो श्वेतांबर 'मिच्छामि दुक्कड़म्' कहते हुए लोगों से क्षमा मांगते हैं। इससे मन के सभी विकारों का नाश होकर मन निर्मल हो जाता है और सभी के प्रति मैत्रीभाव का जन्म होता है।
 
3. मिच्छामी दुक्कड़म प्राकृत भाषा का शब्द है। मिच्छामी का अर्थ क्षमा और दुक्कड़म का अर्थ दुष्ट कर्म होता है अर्थात जाने-अनजाने किए गए बुरे कर्मों के प्रति क्षमा याचना करना।
 
4. हम कभी ना कभी जाने-अनजाने में मन, वचन या कर्म से किसी न किसी व्यक्ति को दु:खी करते रहते हैं। ऐसे में यदि हम उस व्यक्ति के समक्ष जाकर 'मिच्छामी दुक्कड़म' बोल दें तो मन की सारी कड़वाहट मिठास में बदल जाती है और रिश्तो में एक नया भाव भी उत्पन्न होने लगता है।
 
5. क्षमापूर्ण भाव रखने से मन तो निर्मल होता ही है साथ ही मन के निर्मल होने से शारीरिक कष्ट भी मिट जाता है। इसी से परिवार और समाज में शांति की स्थापना होती है।

6. यह पर्व महावीर स्वामी के मूल सिद्धांत अहिंसा परमो धर्म, जिओ और जीने दो की राह पर चलना सिखाता है तथा मोक्ष प्राप्ति के द्वार खोलता है। इस पर्वानुसार- 'संपिक्खए अप्पगमप्पएणं' अर्थात आत्मा के द्वारा आत्मा को देखो। संवत्सरी, प्रतिक्रमण, केशलोचन, तपश्चर्या, आलोचना और क्षमा-याचना। गृहस्थों के लिए भी शास्त्रों का श्रवण, तप, अभयदान, सुपात्र दान, ब्रह्मचर्य का पालन, आरंभ स्मारक का त्याग, संघ की सेवा और क्षमा-याचना आदि कर्तव्य कहे गए हैं।
 
7. संवत्सरी का मूल अर्थ : कालचक्र के अनुसार समय की सुई जैसे पहले नीचे की ओर और फिर उपर की और गति करती है उसी तरह से पर यहां काल को (अवसर्पिणी काल व उत्सर्पिणी काल) दो वर्गों में बांटा गया है।
 
8. अवसर्पिणी काल में जहां ऊपर से नीचे उतरते हुए धर्म की हानि हो रही होती है, वहीं उत्सर्पिणी काल में धर्म का उत्थान हो रहा होता है। मतलब अवसर्पिणी काल में प्रकृति और व्यक्ति दुख की ओर बढ़ रहा होता है और उत्सर्पिणी काल में सुख की ओर। भीषण गर्मी से तप्त धरती पर मेघों की बरसात होती है। 49वें दिन तक यह बरसात धरती को हरा-भरा कर देती है। और तब अहिंसा, प्रेम, सद्भावना भाइचारे का वह मंगलकारी दिन ही संवत्सरी के रूप में मनाया जाता है।
 
9. जैन धर्मानुसार चातुर्मास प्रारंभ होने के 50वें दिन इस पर्व को मनाता है। संपूर्ण चतुर्मास का समय ही आत्मशुद्धि व अंतर्यात्रा का समय होता है। जो चतुर्मास का पालन नहीं कर पाते हैं वे पर्युषण के आठ दिनों में अपनी अंतर्यात्रा की ओर कदम बढ़ा सकते हैं।
 
10. अगर किसी कारणवश इन आठ दिनों में भी आत्म जागरण न कर सकें तो संवत्सरी के आठ प्रहरों में सात प्रहर धर्म आराधना करते हुए आठवें प्रहर में आत्मबोध कर सकते हैं। जय जिनेंद्र।

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

ज़रूर पढ़ें

बुध की उल्टी चाल शुरू: 29 जून से इन राशियों को मिलेगा लाभ, किन्हें रहना होगा सावधान?

3 दिन बाद बुध का कर्क राशि में प्रवेश, इन 4 राशियों की चमकेगी किस्मत, खुलेंगे सफलता के नए द्वार

नरेंद्र मोदी के बाद अगला पीएम अमित शाह या योगी आदित्यनाथ, सटीक भविष्यवाणी

सौर आषाढ़ मास 2026: जानिए इसका धार्मिक महत्व और विशेष परंपराएं

मंगल का शुक्र की राशि में प्रवेश, 3 राशियों को रहना होगा बेहद सावधान, बढ़ सकती हैं ये परेशानियां

सभी देखें

धर्म संसार

27 June Birthday: आपको 27 जून, 2026 के लिए जन्मदिन की बधाई!

Aaj ka panchang: आज का शुभ मुहूर्त: 27 जून 2026: शनिवार का पंचांग और शुभ समय

Sant Kabir: अनपढ़ थे कबीर, फिर कैसे डिगा दी बड़े-बड़े पंडितों की गद्दी? सिकंदर लोदी भी टेक चुका था घुटने!

ज्येष्ठ पूर्णिमा 2026: व्रत का महत्व और 7 अचूक उपाय, जो बदल सकते हैं आपकी किस्मत

संत कबीर जयंती 2026: कबीरदास से जुड़ी 10 अनसुनी और रोचक बातें

अगला लेख