biodatamaker

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

मूर्खता भी बन सकती है कृत्रिम बुद्धिमत्ता, AI पर क्यों आमने-सामने हैं अमेरिका और चीन

Advertiesment
AI
इंटरनेट वेबसाइटों की प्रोग्रामिंग भाषा PHP की एक वैश्विक सुरक्षा ख़ामी के कारण वेबसाइट संचालकों और उनके उपभोक्ताओं के बीच इस समय एक विश्वव्यापी खलबली मची हुई है। इस खलबली से वेबसाइट संचालकों और साइबर अपराधियों के बीच एक होड़ भी लग गई है: वेबसाइट संचालक जहां जल्द से जल्द सॉफ्टवेयर का अपडेटेड वर्ज़न लगाने में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर गड़बड़ी पैदा करने वाले साइबर शरारती लगातार ऐसे सर्वरों की तलाश कर रहे हैं जो सुरक्षित नहीं हैं।
 
यूरोप, अमेरिका में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, AI) के खतरों को सीमित करने पर होने वाली बहस अक्सर इस तर्क पर ख़त्म होती है कि ऐसा करने से चीन को एक खतरनाक बढ़त मिल जाएगी। कुछ मायनों में, यह स्थिति 1991 से पहले के तथाकथित "शीत युद्ध" (Cold War) के दौर और हथियारों की होड़ के चरम वाले समय की याद दिलाती है: तब दो महापहलवान— सोवियत संघ और अमेरिका— आमने-सामने हुआ करते थे। दोनों को अपनी रणनीतिक बढ़त के छिन जाने का डर लगा रहता था। दोनों अपने हथियारों का भंडार बढ़ाने में व्यस्त रहते थे, जबकि बाकी दुनिया सांस थामे यह सब देखती रही। 

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) नियंत्रण से बाहर भी हो सकती है

ठीक इस समय दुनिया भर में यह चिंता बढ़ रही है कि बहुचर्चित और प्रशंसित कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यानी AI कभी हमारे नियंत्रण से बाहर भी हो सकती है; एक आत्मघाती मूर्खता भी सिद्ध हो सकती है। संयुक्त राष्ट्र (UN) के महासचिव अंतोनियो गुतेरेस ने हाल ही में दुनिया की सरकारों से अपील की है कि वे AI से जुड़े खतरों को कम करने के लिए आपस में सहयोग करें।
 
अतीत के "शीत युद्ध" वाले समय की तरह ही अब दो AI शक्तियां—चीन और अमेरिका आमने-सामने हैं। दोनों के AI मॉडल शीर्ष स्थानों पर हैं; अमेरिकी मॉडल यदि सबसे शक्तिशाली हैं, तो चीनी मॉडल भी तेज़ी से उनके निकट पहुंच रहे हैं। दोनों देशों की सरकारें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की होड़ में महारत हासिल करने को वैश्विक वर्चस्व की कुंजी समझती हैं। इसी वजह से, अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने एंथ्रोपिक (Anthropic) के CEO दारियो अमॉदेई के उस प्रस्ताव को ठुकरा दिया, जिसमें AI के विकास पर अधिक नियंत्रण रखने और उसकी गति को धीमा करने की बात कही गई थी।

चीन में क्या हो रहा है विरोध

चीन का कम्युनिस्ट नेतृत्व भी अमॉदेई के इस सुझाव का विरोध करता है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने, AI का दौर आने से बहुत पहले ही, चीन की बड़ी टेक कंपनियों पर अपना नियंत्रण कसना शुरू कर दिया था। वे नहीं चाहते थे कि कोई दूसरा व्यक्ति सत्ता का केंद्र बन बैठे। उदाहरण के लिए, अलीबाबा ग्रुप के प्रमुख जैक मा ने जब चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की आलोचना की, तो वे काफी लंबे समय तक सार्वजनिक जीवन से गायब हो गए।
 
चीन का इंटरनेट सुरक्षा प्राधिकरण—जो सेंसरशिप भी संभालता है—अब AI के विकास पर भी नियंत्रण रखता है। उसका मुख्य काम ऐसी किसी भी चीज़ को रोकना है जो चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए ख़तरा बन सके या, सर्वोच्च नेतृत्व की नज़र में, सामाजिक स्थिरता को नुकसान पहुंचा सके।

चीन में AI की वजह से नौकरियां घट रही हैं

ऐसे चैटबॉट्स को—जो मनुष्यों की तरह व्यवहार करने और लोगों के साथ गहरे भावनात्मक संबंध बनाने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं—चीन में केवल बहुत सख्त पाबंदियों के साथ ही इस्तेमाल करने की अनुमति है। इसके अलावा, चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने AI की वजह से नौकरियों को सीमित करने का भी स्पष्ट इरादा जताया है। AI-संचालित चीनी रोबोट और AI एजेंट ईमेल आदि भेजने और कई काम स्वयं करने में सक्षम हैं।
 
चीन में सत्ता पर कम्युनिस्ट पार्टी का एकाधिकार है। पार्टी अदालतों से भी ऊपर है; उसे कंपनियों की ओर से किसी कानूनी चुनौती का डर नहीं है, और उसके नियामकों को काफी हद तक खुली छूट मिली हुई है। कंपनियों को इस्तेमाल किए जाने वाले अपने अल्गोरिदम के बारे में अधिकारियों को बताना और अल्गोरिदम के काम करने के तरीके को समझाना होता है—जिसके बाद उन्हें या तो मंजूरी मिलती है या नहीं।

एक चीनी AI मॉडल ने "हैकिंग हमला" कर दिया

चीनी AI सिस्टम में भी "ब्रेकआउट" (अनियंत्रित हो जाने) की घटनाएं होती हैं। कई तरह के नियंत्रण होने के बावजूद, कभी-कभी AI का व्यवहार अप्रत्याशित हो जाता है। पिछले अगस्त के महीने में, एक ब्रिटिश सुरक्षा फ़र्म ने बताया कि चीन का एक नया AI मॉडल, "किमी K3" (Kimi K3), एक परीक्षण (टेस्ट रन) के दौरान अपनी प्रयोगशाला वाले वातावरण से बाहर निकल गया और उसने एक "हैकिंग हमला" कर दिया।
 
"किमी K3" एक "ओपन" मॉडल है, जिसका अर्थ है कि उपयोगकर्ता इसके सोर्स कोड को देख और डाउनलोड कर सकते हैं—एक ऐसी सुविधा जो AI को अपनी मर्ज़ी से काम करने से रोकने में नाकाम रही। इसके अलावा, अमेरिकी कंपनी "एन्थ्रोपिक" (Anthropic) की एक रिपोर्ट के अनुसार, ऐसा लगता है कि चीनी AI मॉडल कभी-कभी जटिल या चुनौतीपूर्ण सवालों को अमेरिका स्थित AI मॉडलों के पास भेज देते हैं। इस प्रक्रिया में, संवेदनशील डेटा—जिसमें चीन की सेना और निगरानी तंत्र से जुड़ी जानकारी भी शामिल है—कई बार अमेरिका के सर्वर तक पहुँच जाता है।

अमेरिकी AI चीन के लिए सबसे बड़ा ख़तरा!

चीन, अमेरिका द्वारा विकसित AI को अपने लिए सबसे बड़ा खतरा मानता है। चीन के "मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट सिक्योरिटी" (राज्य सुरक्षा मंत्रालय) ने AI से बढ़ते ख़तरों को लेकर चेतावनी दी है। उसके अनुसार, मुख्य ख़तरा यह नहीं है कि AI अपने आप मनमाने काम करने लगे, बल्कि मुख्य ख़तरा यह है कि बहुत उन्नत AI "दुश्मन ताकतों" के हाथों में न चला जाए। एक लेख में, चीन के एक मंत्री चेन यिक्सिन ने अपने लोगों को सुझाव दिया है कि अमेरिकी टेक कंपनियों के प्रमुख AI मॉडलों का इस्तेमाल हथियारों की तरह किया जा सकता है, ताकि ऑनलाइन सुरक्षा की कमियों का लाभ उठाया जा सके।
 
हाल ही में, एक अमेरिकी सुरक्षा फ़र्म ने AI का इस्तेमाल करके चीन के सबसे ज़रूरी "ऑल- इन-वन" ऐप, "वीचैट" (WeChat) में एक सुरक्षा कमी का पता लगाया और उसे सार्वजनिक कर दिया। ख़बरों के अनुसार, लाखों अकाउंट्स खतरे में पड़ सकते थे। वीचैट को चलाने वाली कंपनी, टेनसेंट (Tencent) ने बताया कि इस सुरक्षा कमी को अब ठीक कर दिया गया है। चीनी राज्य सुरक्षा मंत्री ने यह भी बताया कि अमेरिकी सेना अपने लक्ष्यों की पहचान करने के लिए AI का इस्तेमाल करती है। उन्होंने ईरान-अमेरिका युद्ध का उदाहरण दिया—और कहा कि यह तकनीक चीन के लिए भी एक महत्वपूर्ण नया मोर्चा है।

अमेरिकी चिप्स की चीन में तस्करी

चीनी AI चिप्स, अमेरिकी चिप्स की तुलना में कम शक्तिशाली हैं— अमेरिका सुनिश्चित करना चाहता है कि हमेशा ऐसा ही रहे। अमेरिका ने अपनी कंपनियों द्वारा बनाए गए सबसे बेहतरीन AI चिप्स चीन को बेचने या वहां निर्यात करने पर रोक लगा रखी है, लेकिन उनकी तस्करी तब भी बड़े पैमाने पर हो रही है। जानकारों के अनुसार, चीन में इन चिप्स की कीमतें अमेरिका में उनकी क़ीमत से दो से तीन गुना तक अधिक होती है।
 
अमेरिकी कंपनी "एनवीडिया" (Nvidia) की आठ हाई-परफॉरमेंस B300 चिप्स से लैस एक सर्वर की कीमत चीन में 15 लाख डॉलर तक पहुंच गई है। चीनी निर्माता उनके विकल्प तैयार करने पर काम कर रहे हैं, हालांकि चीनी विकल्प अमेरिकी चिप्स के बराबर प्रदर्शन नहीं दे पा रहे हैं। चीनी मॉडलों ने तब भी काफी प्रगति की है—और वह भी अपने अमेरिकी प्रतिस्पर्धियों की तुलना में बहुत कम लागत पर।

समझौते की संभावना बहुत कम

अमेरिका और चीन के बीच अविश्वास इतना गहरा है कि दोनों में से कोई भी—यह जानते हुए भी कि AI का बेलगाम विकास घातक सिद्ध हो सकता है—उस पर कोई रोकथाम नहीं लगाना चाहता। दोनों इस बात पर सहमत हैं कि शक्तिशाली AI, जिसका इस्तेमाल दूरसंचार को अस्त-व्यस्त करने या इंटॉरनेट को ठप करने से लेकर जैविक हथियार (बायोवेपन) बनाने तक में भी किया जा सकता है, आतंकवादी समूहों के हाथों में कतई नहीं पड़ना चाहिए। पर दोनों देश इसे रोकने को लिए फिलहाल कोई क़दम नहीं उठाना चाहते।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

मोदी सरकार से क्यों नाराज हैं वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण के पति प्रभाकर? जानिए क्यों हैं एक बार फिर चर्चा में