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इंदौर कलेक्‍ट्रेट की जनसुनवाई की ‘कतार’ छोटी क्‍यों नहीं होती, क्‍या निचले विभागों में नहीं हो रही सुनवाई?

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Jan Sunwai indore
आंखों में न्‍याय की उम्‍मीद। चेहरे पर तकलीफ और शिकन। हाथों में आवेदन जिसमें अपनी तकलीफों को दर्ज कर के इंदौर के कलेक्‍ट्रेट कार्यालय में हर मंगलवार को आम लोगों की भीड़ इस आस में पहुंचती है कि यहां उनकी सुनवाई होगी, उन्‍हें न्‍याय मिलेगा। सुबह 10 बजते ही यहां लोगों की कतार लगना शुरू हो जाती है। लेकिन ये भीड़ बहुत कुछ कह रही है। यह कह रही है कि या तो शहर में अन्‍याय बढ़ रहा है या फिर जिला प्रशासन के तमाम विभाग लोगों की समस्‍याएं हल नहीं कर पा रहे हैं और पीड़ितों को मजबूरन कलेक्‍टर कार्यालय का रुख करना पड़ रहा है।

इंदौर कलेक्ट्रेट की मंगलवार को होने वाली जनसुनवाई में लगातार बढ़ती भीड़ के पीछे कई प्रशासनिक, सामाजिक और जमीनी कारण हैं।

1. स्थानीय स्तर (निचले अधिकारियों) पर सुनवाई न होना
भीड़ बढ़ने का सबसे बड़ा कारण यह है कि आम नागरिक जब अपनी समस्याओं को लेकर पटवारी, तहसीलदार, नगर निगम के जोन दफ्तरों या स्थानीय पुलिस थानों के चक्कर काटते हैं, तो वहां उनकी शिकायतों का समय पर निराकरण नहीं होता। जब नीचे के स्तर पर सुनवाई नहीं होती, तो थक-हारकर लोग सीधे कलेक्टर दरबार (जनसुनवाई) का रुख करते हैं।

2. तुरंत एक्शन और 'स्पॉट सेटलमेंट' की उम्मीद
जनसुनवाई में कलेक्टर (जैसे वर्तमान में शिवम वर्मा) और एडीएम/एसडीएम स्तर के वरिष्ठ अधिकारी खुद बैठते हैं। कई गंभीर मामलों (जैसे स्वास्थ्य सहायता, आर्थिक मदद या वरिष्ठ नागरिकों के विवाद) में प्रशासन मौके पर ही फैसला लेता है या संबंधित विभाग को कड़े निर्देश देता है। इस त्वरित कार्रवाई (On-the-spot action) के भरोसे के कारण भी लोगों की उम्मीदें जनसुनवाई से ज्यादा जुड़ी हैं।

3. जमीन, मकान और धोखाधड़ी के बढ़ते मामले
  • इंदौर में रियल एस्टेट और कॉलोनियों का जाल तेजी से फैला है।
  • अवैध कॉलोनियों में प्लॉटों की हेराफेरी,
  • भूमाफियाओं द्वारा धोखाधड़ी
  • पुश्तैनी जमीन-जायदाद के आपसी विवाद
  • नामांतरण (Mutation) व सीमांकन (Demarcation) में हो रही देरी के कारण बड़ी संख्या में पीड़ित कलेक्ट्रेट पहुंच रहे हैं।
4. सरकारी योजनाओं और पेंशन से जुड़ी तकनीकी दिक्कतें
वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन, राशन कार्ड, आयुष्मान कार्ड या हाल ही में मतदाता सूची (Voter List) में नाम कटने/जुड़वाने जैसी समस्याओं के कारण बड़ी संख्या में गरीब और मध्यम वर्ग के लोग परेशान रहते हैं। जब इन योजनाओं का लाभ मिलने में तकनीकी खराबी या कागजी अड़चनें आती हैं, तो लोग न्याय की गुहार लगाने कलेक्ट्रेट आते हैं।

5. बुजुर्गों और महिलाओं के लिए विशेष संवेदनशीलता
कलेक्ट्रेट में वरिष्ठ नागरिकों और महिलाओं की समस्याओं को प्राथमिकता दी जाती है। भरण-पोषण और पारिवारिक विवादों के निपटारे के लिए विशेष कैंप भी लगाए जाते हैं। इस संवेदनशीलता के कारण भी बुजुर्ग और असहाय लोग सीधे यहां आना सुरक्षित और बेहतर समझते हैं। कुन जमा कहें तो कलेक्ट्रेट में बढ़ती भीड़ इस बात का प्रमाण है कि एक तरफ जनता का भरोसा जिला प्रशासन और कलेक्टर पर बहुत मजबूत है, लेकिन दूसरी तरफ यह इस बात का भी संकेत है कि निचले स्तर के सरकारी दफ्तरों (थानों और तहसीलों) को अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करने की सख्त जरूरत है ताकि लोगों को इतनी दूर न भागना पड़े।

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