Hanuman Chalisa

काशी में क्यों खेली जाती है श्मशान की राख से होली, मसाने की होली में रंग की जगह क्या है चिता की भस्म का भेद

WD Feature Desk
बुधवार, 26 फ़रवरी 2025 (18:14 IST)
Masane Ki Holi 2025: सनातन धर्म में होली एक महत्वपूर्ण उत्सव है। पूरे देश में यहां त्योहार अलग-अलग तरीके से बनाया जाता है ब्रज में लड्डू होली लट्ठमार होली का आकर्षण होता है।  साथ ही भारत में होली रंग और गुलाल से खेली जाती है। लेकिन अगर हम काशी की होली की बात करें तो यहां होली पर एक अनोखा ही रंग देखने को मिलता है जब शमशान की राख से महादेव के संग होली खेली जाती है।

काशी में फाल्गुन महीने के शुक्ल पक्ष की एकादशी के अगले दिन हर साल मसान होली का उत्सव मनाया जाता है। इस होली में लोग अधिक संख्या में शामिल होते हैं। इस दिन लोग चिता की राख से होली खेलते हैं और देवों के देव महादेव की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। आइए आपको बताते हैं कि काशी में चिता की राख से ही क्यों होली खेली जाती है।

चिता की राख से होली खेलने के पीछे क्या है कारण 
काशी में खेली जाने वाली मसान होली को चिता भस्म होली के नाम से भी जाना जाता है। चिता की राख से खेली जाने वाली यह होली देवों के देव महादेव को समर्पित है। मसान की होली को मृत्यु पर विजय का प्रतीक माना गया है।
धार्मिक मान्यता है कि भोलेनाथ ने यमराज को हराने के बाद चिता की राख से होली खेली थी। तभी से इस दिन को यादगार बनाने के लिए प्रत्येक वर्ष मसान होली खेली जाती है। 2 दिन तक मनाए जाने वाले इस उत्सव में पहले दिन लोग चिता की राख को एकत्रित करते हैं और इसके दूसरे दिन होली खेलते हैं।

ALSO READ: भारत में इन शहरों की होली देखने विश्व भर से आते हैं बड़ी संख्या में पर्यटक, जानिए क्या हैं परम्पराएं
ऐसे मनाते हैं मसाने की होली
चिता की राख से होली खेलने का ये अदभुत नजारा आपको सिर्फ काशी में ही देखने को मिलेगा। मसान की गली में लोग हर हर महादेव के जयकारों के साथ मृत्यु का जस्ट मानते हैं। फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को भगवान भोलेनाथ अपने औघड़ रूप में काशी के महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर जलती चिताओं के बीच चिता की भस्म की होली खेलते हैं।  मृत्यु का यह उत्सव कुछ इस तरह बनता है कि एक तरफ घाट पर चिता जलती है और दूसरी और गीत संगीत के बीच होली का त्यौहार मनाया जाता है।

जिनका शव आता उन्हें मिलती है मुक्ति: मान्यता है कि मृत्यु के बाद जो भी शवमणिकर्णिका घाट पर दाह संस्कार के लिए आते हैं, बाबा उन्हें मुक्ति प्रदान करते हैं। मान्यता है कि जिस राम-नाम के जप के साथ शव महाश्मशान पहुंचता है तो शिव अपने आराध्य राम के पांव की धूल रूपी चिताभस्म को माथे पर लगा कर मर्यादा पुरुषोत्तम को अपना सम्मान अर्पित करते हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer) : सेहत, ब्यूटी केयर, आयुर्वेद, योग, धर्म, ज्योतिष, वास्तु, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार जनरुचि को ध्यान में रखते हुए सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं। इससे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें।


सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

ज़रूर पढ़ें

बुध की उल्टी चाल शुरू: 29 जून से इन राशियों को मिलेगा लाभ, किन्हें रहना होगा सावधान?

3 दिन बाद बुध का कर्क राशि में प्रवेश, इन 4 राशियों की चमकेगी किस्मत, खुलेंगे सफलता के नए द्वार

नरेंद्र मोदी के बाद अगला पीएम अमित शाह या योगी आदित्यनाथ, सटीक भविष्यवाणी

सौर आषाढ़ मास 2026: जानिए इसका धार्मिक महत्व और विशेष परंपराएं

मंगल का शुक्र की राशि में प्रवेश, 3 राशियों को रहना होगा बेहद सावधान, बढ़ सकती हैं ये परेशानियां

सभी देखें

धर्म संसार

मोबाइल नंबर और अंक ज्योतिष: जानिए कौन से अंक संयोजन बढ़ाते हैं चुनौतियां

Aaj Ka Rashifal: आज का दैनिक राशिफल: मेष से मीन तक 12 राशियों का राशिफल (23 जून, 2026)

23 June Birthday: आपको 23 जून, 2026 के लिए जन्मदिन की बधाई!

Aaj ka panchang: आज का शुभ मुहूर्त: 23 जून 2026: मंगलवार का पंचांग और शुभ समय

निर्जला एकादशी पर दान की वस्तुएं और उनका महत्व

अगला लेख