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योगी आदित्यनाथ का बयान और छिड़ गई बहस, कौन था मायावी कालनेमि? सनातन पर नई बहस?

अनिरुद्ध जोशी
Who was Kalnemi: उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का 'कालनेमि' वाला बयान सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस बयान ने न केवल वर्तमान राजनीति बल्कि रामायण काल के एक मायावी पात्र की यादें भी ताजा कर दी हैं।
 

कालनेमि: क्या है पूरा विवाद?

प्रयागराज माघ मेले के दौरान शंकराचार्य विवाद और धार्मिक विमर्श के बीच मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विरोधियों और षड्यंत्रकारियों पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने 'कालनेमि' का उदाहरण देते हुए कहा।
 
"ऐसे तमाम कालनेमि होंगे, जो धर्म की आड़ में सनातन धर्म को कमजोर करने की साजिश रच रहे होंगे। हमें उनकी पहचान करनी होगी और उनसे सावधान रहना होगा।"
 
मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद लोग यह जानने को उत्सुक हैं कि आखिर रामायण का यह पात्र कौन था और आज के संदर्भ में उसका क्या अर्थ है।
 

रामायण काल का सबसे बड़ा छलिया: कालनेमि

कालनेमि कोई साधारण राक्षस नहीं था; वह रावण का सबसे भरोसेमंद और मायावी अनुचर था। जब युद्ध के मैदान में लक्ष्मण मेघनाद की 'शक्ति' से मूर्छित हो गए और हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने के लिए द्रोणाचल पर्वत की ओर उड़े, तब रावण ने हनुमान को रोकने का अंतिम दांव कालनेमि के रूप में खेला।
 
रूप बदलने में माहिर:
कालनेमि जानता था कि वह बल में हनुमान का मुकाबला नहीं कर सकता, इसलिए उसने छल का सहारा लिया। उसने अपनी माया से हनुमान जी के मार्ग में।
 
 

कालनेमि: हनुमान जी को भ्रमित करने का प्रयास

हनुमान जी जब वहां से गुजरे, तो उन्हें लगा कि कोई महात्मा साधना कर रहे हैं। कालनेमि ने ऋषि बनकर हनुमान जी को भोजन और विश्राम का लालच दिया ताकि संजीवनी लाने में देरी हो जाए और सूर्योदय से पहले लक्ष्मण के प्राण न बच सकें।
 

कालनेमि: मगरी ने खोला रहस्य

हनुमान जी जब उस मायावी तालाब में स्नान करने उतरे, तब एक मगरी ने उनका पैर पकड़ लिया। वह मगरी वास्तव में एक शापित अप्सरा थी। हनुमान जी द्वारा उसका उद्धार होते ही उसने कालनेमि के असली राक्षस रूप का रहस्य खोल दिया। भेद खुलते ही हनुमान जी ने अपनी पूंछ में लपेटकर कालनेमि का वध कर दिया और समय पर संजीवनी लेकर पहुंचे।
 

आज के दौर में 'कालनेमि' का प्रतीक क्या है?

योगी आदित्यनाथ ने इस प्राचीन कथा को आधुनिक राजनीति और समाज से जोड़ा है। उनके बयान के पीछे के मुख्य संकेत ये हैं:
 
वेषधारी शत्रु: ऐसे लोग जो बाहर से धार्मिक या हितैषी दिखते हैं, लेकिन भीतर से जड़ों को काटने का काम करते हैं।
 
भ्रम की राजनीति: जिस तरह कालनेमि ने हनुमान जी को भ्रमित करने के लिए 'राम-नाम' का सहारा लिया, वैसे ही आज भी धर्म की आड़ में कुछ संत षड्यंत्र रचे जा रहे हैं।
 
सावधानी का संदेश: जैसे हनुमान जी ने अपनी चपलता से सत्य को जान लिया, वैसे ही आम जनता को भी छद्म भेषधारियों को पहचानने की जरूरत है।
 

कालनेमि: इतिहास और राजनीति का मेल

यह पहली बार नहीं है जब धार्मिक रूपकों का प्रयोग राजनीति में हुआ है, लेकिन 'कालनेमि' का नाम लेना यह दर्शाता है कि विवाद गहरा है। माघ मेले में संतों के बीच चल रही खींचतान और सनातन धर्म पर हो रहे हमलों को लेकर मुख्यमंत्री ने स्पष्ट कर दिया है कि वह किसी भी 'भीतरी शत्रु' को बर्दाश्त नहीं करेंगे।
 
कालनेमि का वध हमें सिखाता है कि सत्य के मार्ग पर चलने वालों को छल-कपट से सावधान रहना चाहिए। योगी आदित्यनाथ का यह बयान आने वाले समय में धार्मिक और राजनीतिक ध्रुवीकरण को और तेज कर सकता है।

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