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कहानी: प्रेम सम्मान

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सुशील कुमार शर्मा

, शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2026 (14:56 IST)
कस्बे के उस पुराने सरकारी कन्या विद्यालय की पीली पड़ चुकी दीवारों के पीछे एक ऐसा मौन पसरा रहता था, जो अक्सर मध्यांतर की शोर-शराबे वाली आवाजों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा देता था। इसी विद्यालय की वरिष्ठ शिक्षिका थीं वैदेही। वैदेही, जिनके नाम में ही विदेह की गरिमा और जानकी की पीड़ा समाहित थी। वे केवल एक अध्यापिका नहीं थीं, वे इस धूल भरे कस्बे के लिए सौंदर्य और विद्वत्ता का एक ऐसा प्रतिमान थीं, जिसे दूर से निहारा तो जा सकता था, पर छुआ नहीं जा सकता था।
 
उनका रूप? जैसे किसी शिल्पी ने शरद ऋतु की चांदनी को संगमरमर में ढाल दिया हो। लंबी छरहरी काया, बड़ी-बड़ी हिरनी जैसी आंखें जिनमें सदैव एक हल्का सा धुंधलका छाया रहता, और वाणी ऐसी कि जैसे निर्झरिणी पत्थरों से टकराकर संगीत पैदा कर रही हो। उनकी साड़ियों के सलीकेदार पल्लू और माथे पर बिंदी की स्थिरता उनकी आंतरिक दृढ़ता का परिचय देती थी। किंतु उस दृढ़ता के पीछे एक ऐसा हृदय धड़कता था, जो शब्दों के मायाजाल में कैद हो चुका था।
 
उनका प्रेम कोई साधारण आकर्षण नहीं था। वह प्रेम था शिखर के प्रति। शिखर, जिनका नाम ही साहित्य की दुनिया में उस ऊंचाई का प्रतीक था जहां तक पहुंचना साधारण जन के बस की बात नहीं थी।
 
शिखर उसी कस्बे के पुश्तैनी हवेली के वारिस थे, किंतु उनका वास्तविक घर उनकी रचनाओं के शब्द थे। उनके उपन्यास और कविताएं देश की बौद्धिक चेतना को झकझोरती थीं। उनका व्यक्तित्व इतना विराट था कि जब वे कस्बे की लाइब्रेरी की सीढ़ियों से उतरते, तो समय जैसे अपनी गति धीमी कर लेता। भारी आवाज, खिचड़ी बाल, और आंखों में एक ऐसी दार्शनिक गहराई जो सामने वाले के अस्तित्व को आर-पार देख ले।
 
वैदेही उन्हें वर्षों से पढ़ती आ रही थीं। वे उनके शब्दों की पूजा करती थीं। उनकी हर नई किताब वैदेही के लिए किसी ईश्वरीय प्रसाद जैसी होती। पर यह उपासना केवल पन्नों तक सीमित नहीं थी। संयोगवश, शिखर का भांजा वैदेही की ही कक्षा में पढ़ता था, और इसी सूत्र ने उन्हें कई बार आमने-सामने खड़ा किया था।
 
वैदेही के भीतर एक ज्वालामुखी धड़कता था, पर अधरों पर सदैव 'साहित्यिक मर्यादा' की बर्फ जमी रहती। वे जब भी शिखर से मिलतीं, उनकी मेधा और सौंदर्य के सम्मुख शिखर भी क्षण भर के लिए अपनी शब्द-सामर्थ्य खो देते थे। पर विडंबना देखिए, जिस व्यक्ति के पास संसार की हर भावना को व्यक्त करने के लिए हज़ारों शब्द थे, वह वैदेही की उपस्थिति में 'मौन' का पर्याय बन जाता।
 
एक शाम, कस्बे के वार्षिक साहित्य उत्सव के बाद, जब आकाश सिंदूरी हो रहा था, दोनों पुस्तकालय के एकांत गलियारे में आमने-सामने थे।
 
वैदेही के हाथों में शिखर का नया कविता संग्रह था। उन्होंने कांपते स्वर में पूछा, 'शिखर जी, आपकी इस नवीनतम कृति में जो विरह है, क्या वह केवल कल्पना है या किसी अधूरेपन की प्रतिध्वनि?'
 
शिखर ने चश्मा उतारकर वैदेही की ओर देखा। उस क्षण वैदेही की सुंदरता अपनी पूरी आभा में थी। सूर्यास्त की किरणें उनके चेहरे पर पड़कर उन्हें किसी देवालय की प्रतिमा जैसा आभास दे रही थीं।
 
शिखर धीमे स्वर में बोले, 'वैदेही, लेखक जो लिखता है, वह उसका आधा सत्य होता है। शेष आधा सत्य वह होता है, जिसे वह चाहकर भी कागज़ पर उतार नहीं पाता। कभी सामाजिक मर्यादाओं की बेड़ियों के कारण, तो कभी अपनी ही 'बौद्धिक श्रेष्ठता' के दंभ के कारण।'
 
वैदेही ने पलकें झुका लीं। 'क्या बड़ा होना इतना कष्टदायी है कि इंसान अपनी सहज भावनाओं को व्यक्त करने का अधिकार भी खो दे?'
 
शिखर एक कदम आगे बढ़े, उनकी आत्मा वैदेही के प्रेम को महसूस कर रही थी। वे जानते थे कि यह स्त्री उनसे कितना अगाध प्रेम करती है। उन्हें पता था कि वैदेही की डायरी के पन्नों पर उनके नाम के कितने अश्क गिरे होंगे। पर ठीक उसी क्षण, उनके कानों में समाज की वे कर्कश आवाजें गूंज उठीं, जो जाति और कुल की ऊंची दीवारों पर पहरा दे रही थीं।
 
शिखर का कुल उच्च ब्राह्मणों का वह गढ़ था जहां 'शुद्धता' के नाम पर भावनाओं का गला घोंटा जाता था। वैदेही, जो एक भिन्न जाति और साधारण पृष्ठभूमि से आती थीं, उस हवेली की चौखट कभी पार नहीं कर सकती थीं।
 
शिखर ने लंबी सांस ली और कहा, 'वैदेही, कुछ पात्रों को ईश्वर केवल दूर से प्रेम करने के लिए गढ़ता है। उन्हें पास लाना, उनकी गरिमा को खंडित करना होता है।'
 
वैदेही की आंखों में आंसू भर आए। 'और यदि वह पात्र स्वयं खंडित होने को तैयार हो? यदि वह अपनी गरिमा को आपके शब्दों के चरणों में चढ़ा देना चाहे, तब?'
 
शिखर का हृदय चीख उठा, 'मैं भी तुमसे उतना ही प्रेम करता हूं वैदेही! तुम्हारी यह विद्वत्ता, यह सौंदर्य, यह समर्पण... यह सब मेरे साहित्य का केंद्र है।' पर उनके मुख से केवल इतना निकला, 'तब भी... समय हमें अपराधी ही मानेगा।'
 
महीने बीतते गए। दोनों के बीच पत्रों का एक सिलसिला शुरू हुआ, पर उनमें भी 'प्रेम' शब्द का प्रयोग वर्जित था। वे दर्शन, साहित्य और समाज पर बातें करते, पर उन पंक्तियों के बीच के खाली स्थान में उनकी तड़प स्पष्ट दिखाई देती थी।
 
वैदेही के घरवाले उनके विवाह के लिए दबाव बना रहे थे। उनके पास कई बड़े घरानों के रिश्ते थे, पर वैदेही ने मौन का व्रत धारण कर लिया था। उनकी सुंदरता अब पीली पड़ने लगी थी, जैसे कोई फूल बिना धूप के कुम्हला रहा हो।
 
एक दिन, शिखर को पता चला कि वैदेही का स्थानांतरण किसी दूरदराज के पहाड़ी गांव में हो गया है। वे समझ गए कि यह वैदेही का स्वयं को उनसे दूर करने का अंतिम प्रयास है। वे उनसे मिलने स्टेशन पहुंचे।
 
भीड़भाड़ वाले स्टेशन पर, रेलगाड़ी की सीटी के बीच, दोनों एक बार फिर आमने-सामने थे। वैदेही की आंखों में अब कोई प्रश्न नहीं था, केवल एक शांत स्वीकारोक्ति थी।
शिखर ने एक छोटी सी डायरी उनकी ओर बढ़ाई। 'इसमें मेरा वह सत्य है, जो मैंने कभी प्रकाशित नहीं किया।'
 
वैदेही ने उसे सीने से लगा लिया। उन्होंने धीमे से कहा, 'शिखर जी, समाज जीत गया, जाति जीत गई, आपका 'बड़ा व्यक्तित्व' जीत गया। हार गया तो केवल वह प्रेम, जो आपके शब्दों में तो अमर है, पर मेरे जीवन में मृत।'
 
शिखर कुछ कहना चाहते थे। उनका हाथ बढ़ा कि वैदेही का हाथ थाम लें, उन्हें रोक लें, चिल्लाकर कहें कि वे इस दुनिया की सारी दीवारों को ढहा देंगे। पर समाज के संस्कार और अपनी ही बनाई हुई 'आदर्श पुरुष' की छवि ने उनके पैरों में बेड़ियां डाल दीं।
 
गाड़ी चल पड़ी। वैदेही खिड़की से बाहर देखती रहीं जब तक कि शिखर का वह 'विराट व्यक्तित्व' एक छोटे से बिंदु में बदलकर ओझल नहीं हो गया।
 
वर्षों बाद, जब शिखर का निधन हुआ, तो उनके सिरहाने वही पुरानी डायरी मिली। उसके अंतिम पृष्ठ पर लिखा था 'वैदेही, मैं डर गया था। लोग कहते हैं मैं शब्दों का जादूगर हूं, पर मैं अपनी ही जाति और समाज के सामने एक कायर सिद्ध हुआ। तुम्हारा सौंदर्य मेरे शब्दों की शक्ति था, पर मेरा अहंकार तुम्हारी आंखों के आंसुओं को नहीं पोंछ सका। हम साहित्य के पन्नों पर मिलेंगे, जहां न कोई जाति होगी, न कोई दीवार।'
 
वैदेही आज भी उस पहाड़ी गांव के स्कूल में पढ़ाती हैं। वे आज भी उतनी ही सुंदर हैं, पर वह सौंदर्य अब एक तपस्या बन चुका है। वे हर रोज शिखर की कृतियां पढ़ती हैं, और हर शब्द में खुद को ढूंढती हैं।
 
कहानी समाप्त हो गई, पर क्या यह प्रेम वास्तव में अधूरा रहा? क्या समाज की बनाई दीवारें इतनी सुदृढ़ हैं कि दो महान आत्माओं के मिलन को रोक सकें?
 
शिखर ने अपनी छवि बचाने के लिए प्रेम का बलिदान दिया, और वैदेही ने प्रेम को बचाने के लिए स्वयं का बलिदान कर दिया। 
 
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