Dharma Sangrah

कही-अनकही 21 : वर्क-फ्रॉम-होम बनाम वर्क-लोड

अनन्या मिश्रा
वर्क-फ्रॉम-होम सपने जैसा लगता था। लेकिन शुरुआत में जब कोरोना काल के चलते सभी को वर्क-फ्रॉम-होम करना पड़ा तो घर और ऑफिस के कामों में सामंजस्य बनाने में काफी समय लग गया... घर के कामों के साथ अधिकाँश बोझ महिलाओं पर आया, क्योंकि अब चूँकि सब घर पर ही थे, तो उनसे घर के कामों की अपेक्षा ही नहीं बढ़ी बल्कि घरेलू कामों में लगने वाला समय भी बढ़ गया।

जैसे-तैसे काम की आदत पड़ी तो लॉकडाउन खुल गया और सब फिर से ऑफिस लौटे। हालाँकि यह भी आसान नहीं था। वर्क लोड तो सभी का बढ़ गया था, सबकी आदतों में भी बदलाव आया था, लेकिन एना और आदि की ज़िन्दगी जस की तस ही थी... आपका क्या विचार है, किस प्रकार इस वर्क-बैलेंस को प्राप्त किया जा सकता है? 
 
शाम के खाने के समय एना टीवी देख रही थी और आदि फ़ोन पर मेसेज कर रहा था...
 
‘हो गया हो काम आदि, तो खाना भी खा लो... ठंडा हो रहा है...’
 
‘हम्म... ऑफिस के ग्रुप पर मेसेज आ रहे हैं... डेडलाइन है और काम पूरा हो नहीं रहा...’
 
‘खाने के बाद कर लेना ये सब...’
 
‘खाने के बाद वैसे भी मुझे प्रेजेंटेशन बनाने हैं... तुम खा के सो जाना...’
 
‘तुम फिर वहीँ बेडरूम में बैठ कर काम कर लो न... मैं वहीँ सो जाउंगी...’
 
‘नहीं, तुम्हारी आँखों पर लैपटॉप की लाइट पड़ेगी न फिर...’
 
‘नहीं, मैं वैसे भी मेरे घर पर बल्ब ऑन रख कर सोती थी... फर्क नहीं पड़ेगा... कम से कम तुम साथ तो रहोगे...’
 
‘नहीं, मैं वहां बैठ कर काम नहीं कर सकता...’
 
‘आदि, ऐसा क्या काम है कि तुम मेरे सामने नहीं कर सकते? प्रेजेंटेशन ही है न? रोज़ रहता है? इतना काम है तुमको?’
 
‘हां, सभी कर रहे हैं एना... रात को 2-2.30 बजे तक तो ईमेल ही आते हैं... तुम नहीं समझोगी... तुम्हारे जैसे नहीं है मेरा जॉब कि बस केबिन में बैठ के चार ईमेल भेज दिए और हो गया...’
 
‘काम का प्रेशर तो मुझे भी उतना ही है, आदि... मैं बस कोशिश करती हूँ की ऑफिस का काम ऑफिस में छोड़ कर आऊँ, ताकि घर आ कर तुम्हारे साथ कुछ बातें भी कर सकूं... शादी को दो महीने भी नहीं हुए हैं... और तुमको बात तक करने की फुर्सत नहीं है...’
 
‘क्या बात करूँ तुमसे? और तुमको बात करनी हो तो करो न... मैं काम करता रहूँगा, तुम बोलती रहो... मैं सुनता रहूँगा...’
 
‘मैं क्यों डिस्टर्ब करुँगी फिर अगर तुम बस सुनते रहोगे? एक काम करते हैं... मेरे पास भी ऑफिस का बहुत पेंडिंग काम है... कल से मैं भी रात में करुँगी... इस बहाने हम दोनों बैठ कर काम भी कर लेंगे और साथ में थोडा समय भी बिता लेंगे...’
**** 
अगली रात को एना ने सोचा वह भी आदि का साथ देगी... इस  बहाने कुछ समय तो साथ बिता सकेंगे:
 
‘चलो खाना खा लो, आदि... फिर आज मुझे भी काम है...’
 
‘खा लो पहले एना....’
 
‘चलो, ऑफिस का काम कर लेते हैं... म्यूजिक चला लें?’
 
‘तुम करो काम... मुझे सोना है आज एना...’
 
‘अरे? क्यों? रोज़ तो तुमको काम रहता है... आज मुझे काम है तो तुम सो रहे हो? आज काम नहीं है तुम्हें? मैंने सोचा था साथ बैठ लेते और काम भी हो जाता...’
 
‘तो? मेरे काम करने से भी दिक्कत है और मेरे सोने से भी दिक्कत है तुम्हें? हर चीज़ में तुमको दिक्कत रहती है... मैंने रोका था क्या तुमको सोने से जब मैं काम करता था? नहीं न? और ये ऑफिस का काम तो तुम सिर्फ मुझसे बदला लेने के लिए ले कर आज घर आई हो... और तुमसे क्या बात करूँ मैं? यही कारण है कि मैं तुमसे ज्यादा बात नहीं करता... सो रहा हूँ मैं... तुम संभालो अपना खुद का वर्क-लोड...’
 
आप अपना वर्क-लोड कैसे संभालते हैं? 
 

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