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लघुकथा : समीकरण

प्रज्ञा पाठक
पृथ्वी पर जब जीवन-क्रम आरम्भ हुआ,तब उसका समीकरण था-प्रकृति+मनुष्य=जीवन।
 
शनैः शनैः पृथ्वी पर औजार आए,जिनसे मानव का कार्य सुगम हो गया। परिवर्तित स्थितियों में समीकरण भी परिवर्तित होकर मनुष्य+मनुष्य+प्रकृति=जीवन हो गया।
 
कुछ समय पश्चात् पृथ्वी पर यंत्रों का पदार्पण हुआ,जो इतने प्रभावशाली थे कि मनुष्यों को भी अपने रूप में ढाल लिया। फलतः समीकरण बदलकर मनुष्य+मनुष्य=जीवन हो गया।
 
आज तक मौन व अपरिवर्तनशील रही प्रकृति ने अब अपने मर्यादित कूलों को स्वच्छन्द कर दिया।
 
परिणामस्वरूप समीकरण प्रकृति+प्रकृति=विनाश हो गया,जिसे कोई औजार अथवा यंत्र या मनुष्य भंग नहीं कर पाया।

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