पग-पग रावण मिलते अब तो, कन्याओं को हर रहे हैं, कुकर्म कर्म नित्य कर रहे हैं। कभी भेष साधु का धरकर, मंडप-महल सजाते हैं। मौका पाय हैवान वे बनते, दामन पर दाग लगाते हैं। मीठी-मीठी बातों से अपनी, अबलाओं को छल रहे हैं, कुकर्म कर्म नित्य कर रहे...