Narak Chaturdashi
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प्रेम कविता : गीत बनकर वो आने लगे

राकेशधर द्विवेदी
गीत बनकर वो आने लगे
गीत बनकर वे आने लगे
अधरों पर मुस्कुराने लगे
राज अंखियन का क्या कहूं मैं
उनके नैना कजरारे लगने लगे
गीत बनकर वे आने लगे
गीत बनकर वे आने लगे।
गजल बन कर गुनगुनाने लगे
राज दिल का कहूं मैं क्या 
हिचकी बनकर वो सताने लगे
अधरों पर वे मुस्कुराने लगे
गीत बनकर वे आने लगे।
आइनों ने जब देखा उन्हें
वो खुद ही शरमाने लगे
डूब जाने लगा हूं खुद ही मैं
मुझको वो मैखाने लगने लगे
और हम डूब जाने लगे।
अधरों पर वे मुस्कुराने लगे
गीत बनकर वे आने लगे।

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