घाव जब नासूर बन जाए, गहन उपचार जरूरी है,
शांत अहिंसक भाव हमारा, संहार पर मजबूरी है।
रगों में शोणित उबला है, रिपुओं का मस्तक लाने को,
देखें चंगुल से ग्रीवा की, अब कितनी दूरी है।
क्षमा करने की नीति को कायरता क्यों समझ लिया,
आमंत्रण है अब रणांगण में तैयारी अबकी पूरी है।
कट-कट कर यों अरि गिरें ज्यों पतझर पात पके झरें
बीत रही ये तिमिर निशा प्राची देखो सिंदूरी है।
About Writer
पं. हेमन्त रिछारिया
ज्योतिर्विद पं. हेमन्त रिछारिया ज्योतिष प्रभाकर उपाधि से सम्मानित हैं। विगत 12 वर्षों से ज्योतिष संबंधी अनुसंधान एवं ज्योतिष से जुड़ी गलत धारणाओं का खंडन कर वास्तविक ज्योतिष के प्रचार-प्रसार में योगदान दे रहे हैं। कई ज्योतिष आधारित पुस्तकों का लेखन।....
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