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कविता : पेड़ एक मंदिर

जयति जैन 'नूतन'
हर पेड़ एक मंदिर है,
कोई नया, कोई पुराना।
कोई पतझड़ में बिखरा,
कोई बसंत में खिलता।
 
लेता कभी न कुछ,
देता नि:स्वार्थ भावपूर्ण।
छांव हो या शीतल हवा,
पुष्प हो या फल हो।
 
सिखाता हमेशा,
झुककर चलना,
मिलकर चलना।
वक्त का दामन थामे,
आसमां को छूना।
 
ना अंधेरों की चिंता,
ना उजाले से गिले।
सुकून मिलता उसे,
आकर जो बैठे तले।

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