एक ताज को उपयुक्त सिर की तलाश है।
सभी घाघ चुप्पी साधे हैं मौन।
डूबते जहाज का स्टीयरिंग थामे कौन।।
सब अपने ऊपर आई बला को टाल रहे।
अपने पाले से गेंद दूसरे के पाले में उछाल रहे।।
शायद सबको दिखने भी लगा कि
इसमें अंतरनिहित विनाश है।।1।।
खुशामद की दुकानों के शटर धड़ाधड़ गिर रहे।
निचले वफादार (बिन सरमाया) बदहवास से फिर रहे।।
फक्त सलाम से सलामती का वह अधिकार, अब मिलेगा कहां।
खुशामद से बरग़लाया जा सके, ऐसा परिवार अब मिलेगा कहां।।
सारी पुरानी वफ़ादारियां विघटन के आसपास हैं।।2।।
उत्तर के महारथियों की, एक अनकही मिलीभगत है।
दक्षिण भी कम नहीं है, वह हर पैंतरे में पारंगत है।।
इसीलिए उस बुजुर्ग पार्टी की, हर तरफ से दुर्गत है।
स्वहित से ऊपर उठकर सोच की, कहिए किसको फुर्सत है।।
राजनीति में सिद्धांत, वफादारी व समर्पण सब जुमले बकवास हैं।।
बेचारा जमीनी कार्यकर्ता ही बस दिल से व्यथित है, उदास है।।3।।
About Writer
डॉ. रामकृष्ण सिंगी
डॉ. रामकृष्ण सिंगी ने मध्यप्रदेश के शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में 40 वर्षों तक अध्यापन कार्य किया तथा 25 वर्षों तक वे स्नातकोत्तर वाणिज्य विभागाध्यक्ष व उप प्राचार्य रहे। महू में डॉ. सिंगी का निवास 1194 भगतसिंह मार्ग पर है। डॉ. सिंगी देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर (मप्र) के वाणिज्य संकाय....
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