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हिंदी कविता : शिव संवाद

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kavita
शिव संवाद
 
कर्म की व्याख्या क्या करूं
जो करवाते हो 
वह कर्म तुम्हीं को समर्पित 
मेरे कर्म यदि मेरे नहीं 
तो फल भी नहीं मेरे
मेरे धर्म तुम्हारे 
तुम्हीं हो धर्मप्रवर्तक मेरे...
 
मेरे महत्तर स्वार्थ के लिए
जो तुम्हारे आदेश शिरोधार्य
मैं तो मर्त्य की नारी हूं
मोह मद लोभ काम को जीत भी लूं
तो जीत के बोध को 
कैसे जीतूं ,वह शक्ति भी
तो तुम दोगे और मैं 
नारी से देवी बनने की चाह छोड़
केवल अपना कर्म कर जाऊं
मेरे कर्म तुम्हारे 
तुम्हीं हो कर्मप्रवर्तक मेरे....
 
मेरे शैशव की स्मृति तुम
तरुणाई के अनुगान् भी तुम
प्रेम जो अनुभूत सत्य था
तुम्हारे ही साथ से 
 
अज्ञान सलिल की बूंदें
बन झर जाऊंगी चरणों में तुम्हारे 
मेरे अपूर्ण प्रयास की पूर्णता
को सार्थकता देते परम सत्य तुम
मैं अल्पज्ञ नेह चंद्रिका 
तुम सहस्त्र सूर्य प्रखर मेरे....

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