ramcharitmanas

कविता : दुनिया का तमाशा

Webdunia
- पंकज सिंह
 
दुनिया का तमाशा चलता रहता है,
मनोरंजन इसका कभी ना रुकता है।
 
लाख जतन बादल करता है,
मेला भरने से ना रुकता है। 
 
झूम उठती हर क्यारी है,
गाने लगती बस्ती न्यारी है।
 
छत पर जब थाली बजती है,
किलकारी घर में गूंजती है।
 
बचपन कहां गुम हो जाता है,
रवि सिर पर चढ़ आता है।
 
किरणों से जीवन तप जाता है,
देख बुढ़ापा प्राणी रोने लगता है।
 
पानी का बुलबुला फूट जाता है,
बहता हवा-सा थम जाता है।
 
खिलाड़ी समझ दांव लगाता है,
दर्शक बन रह जाता है।
 
जोड़-तोड़ खूब करता है,
गांठ की पूंजी गंवा देता है।
 
सूरज जाता है, चांद आता है,
चांद ना हो तो तारा होता है।
 
सितारा बन आसमां में उभरता है,
तकदीर का बादशाह बन जाता है।
 
वक्त बड़ा बेरहम होता है,
भोर का तारा भी छुप जाता है।
 
पीढ़ियां यहां कितनी दफन है,
दूसरे के कंधे पर पहले का तन है।
 
मैं भी आया मुझे भी जाना है,
ना रोक पाएगा जमाना है।
 
आने वाला जी भरकर रोता है,
जाने वाला चैन की नींद सोता है।
 
बहुत चल लिया अब सुस्ताना है,
चला-चली का खेल पुराना है।

सम्बंधित जानकारी

Show comments
सभी देखें

जरुर पढ़ें

मच्छर के काटने से खुजली क्यों होती है? जानें वैज्ञानिक कारण और उपचार

Health Tips: बॉड़ी में शुगर कम होने पर क्या-क्या परेशानियां होती हैं, जानें काम की बातें

हाथों और आंखों में छिपे हैं लिवर की बीमारी के संकेत! भूलकर भी न करें इन्हें नजरअंदाज

बारिश के मौसम में चाय के साथ बनाएं ये 5 परफेक्ट कॉम्बिनेशन वाले क्रिस्पी स्नैक्स, हर कोई करेगा तारीफ

समय रहते अगर हो जाए लक्षणों की पहचान, तो कैंसर जैसे रोगों का उपचार भी संभव

सभी देखें

नवीनतम

कांवड़ यात्रा : ‘बोल बम’ का सनातन संदेश

भारत की विभिन्नताओं में समाहित है अटूट अभिन्नता!

स्पेन में मोरक्को से घुसपैठ, यूरोपीय संघ में मचा हड़कंप

दादाजी की याद में पोती की पाती, पढ़कर आंखें भी नम होगी, उर्जा भी मिलेगी

क्यों मनाया जाता है विश्व आदिवासी दिवस? जानिए इतिहास और इसका महत्व

अगला लेख