जीवन की बिखरे सिहरे पथ पर, अपनेपन के फूल खिलें जब। उद्विग्न, दु:खी, तिरस्कृत होकर भी। नि:शब्द विवश, सब कुछ खोकर भी। मन में आस विहास लिए हंसना अबकी बार मिलें जब। अर्थहीन नीरस, सपने हों। टीस बढ़ाते, जब अपने हों। दर्द के कुछ साझे शब्दों में, कहना कुछ तुम...