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हिन्दी कविता : पत्थरों की इबादत

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Hindi poem
हे पत्थरों की इबादत करने वालों...
मैं तुम्हें सजीवन नहीं कहता हूं
तुम होंगे सजीव अपने में
पर मैं अजीब नहीं कहता हूं।
 
सदियों से तुमने
जिन पत्थरों पर विश्वास किया
नित पुष्प चढ़ाए और दीप जलाए
जल से उनका श्रृंगार किया
कदमों में उनके दीपक ने
जल-जलकर खुद का नाश किया।
 
हे पत्थरों की इबादत करने वालों...
ये पत्थर क्या जाने मन की चाहें, 
ये पत्थर क्या पहचानें अंतर की दाहें
प्राणों की सुर तानों को
यह पत्थर क्या आभास करेगा?
 
हे पत्थरों की इबादत करने वालों...
क्यों अर्पित करते हो मन की ममता
क्यों अर्पित करते हो तन की क्षमता
तेरी इन दुर्बलताओं का
यह पत्थर क्या आभास करेगा?
 
हे पत्थरों की इबादत करने वालों... 

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