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अटल बिहारी वाजपेयी का "जीवन बीत चला"

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कल, कल करते आज
हाथ से निकले सारे,
भूत भविष्यत् की चिंता में
वर्तमान की बाजी हारे,
 
पहरा कोई काम न आया
रसघट रीत चला।
जीवन बीत चला।
 
हानि-लाभ के पलड़ों में
तुलता जीवन व्यापार हो गया,
मोल लगा बिकने वाले का,
बिना बिका बेकार हो गया,
 
मुझे हाट में छोड़ अकेला
एक-एक कर मीत चला।
जीवन बीत चला।

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