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हिन्दी दिवस विशेष : क्या हिन्दी पर शर्म है!

तरसेम कौर
क्या आपको शर्म महसूस होती है कि आप अच्छी इंग्लिश नहीं बोल पाते या आपको अपने बच्चे का एडमिशन कराना है एक अच्छे पब्लिक स्कूल में, या इंग्लिश ठीक से न बोल पाने से आपको नौकरी नहीं मिलती है या फिर आपका सोशल स्टेट्स अच्छा नहीं बन पाता है..?
 
आए दिन इस तरह के कई विज्ञापन हमें देखने को मिल जाते हैं। अब तो इस तरह के मैसेज भी आने लगे हैं मोबाइल पर। इंग्लिश स्पीकिंग कोर्सेस के इंस्टीट्यूट्स तो जैसे कुक्करमुत्ते की तरह उगने लगे हैं हर गली मौहल्ले में भी। भले ही वहां इंग्लिश सि‍खाने वाले खुद नोट्स पढ़-पढ़ कर आगे सि‍खाने की जद्दोजहद में लगे हुए हैं। वहां सीखने वाला भी भला क्या सीखेगा...? कुछ रोज़मर्रा के इस्तेमाल के वाक्य सि‍खा दिए, कुछ ग्रामर वगैरह बता दी, कुछ कठिन शब्दों की सूची थमा दी...चलिए इसी में 6 हफ्ते बीत गए। अपनी फीस ऐंठ ली और आखिर में बोल दिया कि यह तो आपकी अपनी प्रैक्टिस है, जितना पढ़ेंगे-बोलेंगे उतनी ही जल्दी सीख जाएंगे। तो पूछिए भला यहां सीखने वाला झक मारने आया था क्या ?
 
हिन्दी या अपनी किसी भी भाषा को लिखने बोलने या आम बोलचाल में इस्तेमाल करने की भला क्या शर्म ..??  फिर भी हम लोग इंग्लिश बोलते हैं आपस में , जबकि पता है कि सामने वाले को भी वो भाषा आती है। इतनी मजबूरी है आजकल इंग्लिश सीखने की, कि आप अगर अच्छी इंग्लिश नहीं बोल पाते हैं कुछ लोगों के बीच में खड़े होकर, तो आपको कुछ आत्मग्लानि या शर्म सी महसूस होती है। शायद इसलिए हिंगलिश का चलन काफी बढ़ गया है आम बोलचाल में।
 
जहां तक मैंने गौर किया है, यह मानसिकता ईस्ट एशियाई देश के लोगों में देखने को नहीं मिलती है जैसे जापान, कोरिया, चीन आदि। वहां के राजनेता भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी मातृभाषा ही इस्तेमाल करते हैं भले भी उनके साथ दुभाषिए रहते हैं। या बात कर लीजिए मिस यूनिवर्स या मिस वर्ल्ड जैसी सौंदर्य प्रतियोगिताओं की। बात यह नहीं है कि उन लोगों को इंग्लिश लिखना बोलना नहीं आती, अपितु यह उनका प्रेम है अपनी मातृभाषा के प्रति..!
 
वैसे गौरतलब है कि मोदीजी भी हिन्दी भाषा ही इस्तेमाल करते हैं ज्यादातर अपने संबोधन में। आने वाले समय में यह बात एक अच्छा प्रभाव छोड़ेगी हम भारतीयों  में अपनी भाषा के प्रति प्रेम पर।

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