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जूतों पर टैक्स

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लालकृष्ण आडवाणी
- महेंद्र साँघी

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वेबू- काका दुनिया में क्या जूते फेंकने का रिवाज-सा चल पड़ा है। पहले जॉर्ज बुश पर जूता फेंका गया। फिर वित्तमंत्री पी. चिदंबरम पर और कांग्रेस के संसदीय प्रत्याशी नवीन जिंदल पर। हाल ही में लालकृष्‍ण आडवाणी जी पर भी खड़ाऊ फेंकी गई।
काका- हाँ सुना है मैंने। बेचारे जू्ता फेंकने वाले।

वेबू- ताज्जुब से बेचारे ! अर्थात् आपको जूता फेंकने वालों से सहानुभूति हो रही है, जूता खाने मेरा मतलब जूते का वार झेलने वाले नेताओं से नहीं।
काका- देखो बेटा हिंदुस्तान का रिवाज है कि जब चार पहिया और दो पहिया वाहन में टक्कर होती है तो जनता की सहानुभूति दो पहिएवाले वाहन चालक के साथ होती है। यही टक्कर दुपहिया और पैदल यात्री में होती है तो जनता दुपहिया चालक को पीट देती है।

वेबू- ओहो ! त‍ो आपकी नजर में जू‍ता फेंकने वाले पैदल यात्री के समान हैं।
काका- एकदम ठीक।

वेबू- काका फिर भी जूता फेंकने के कृत्य को आप सही समझते हैं।
काका- नहीं जूता फेंकना निहायत ही बेवकूफाना हरकत है।

वेबू- वह क्यों?
काका- क्योंकि सभी जूता फेंकने वालों का नाम जरूर मीडिया के द्वारा प्रचारित हो जाता है मगर फजीहत भी कम नहीं होती। मौके पर ही पिटाई का भी खतरा रहता ही है।

वेबू- यदि आपका मानना है कि उन्हें जूता नहीं फेंकना चाहिए था तो भला वे क्या करते? किस तरह अपने मन की भड़ास निकालते।
काका- कुछ भी हो उन्हें जूता नहीं फेंकना था। जूता फेंकने से चोट लग सकती है।

वेबू- मगर 'जूतमपैजार' शब्द बताता है कि जूतों के द्वारा पूजा दिल की भड़ास निकालने का पुराना नुस्खा है।
काका- है मगर जूतम पैजार में जूता हाथ में लेकर दुश्मन को उसकी सचेतावस्था में मारा जाता है ताकि उसे बचाव का पूरा मौका मिल सकें। यूँ दूर से अचानक फेंक कर नहीं।

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वेबू- काका मगर जब लक्ष्य के समीप जाना यदि संभव न हो तो कोई क्या करें?
काका- उसके लिए हमारे देश में पुराना तरीका है। जूते के बजाय टमाटर फेंको जिससे सामने वाले को लगे भी नहीं और अपने जूते की जोड़ भी न बिगड़े। गाँधीगिरी अपना कर फूल भी फेंके जा सकते हैं।

वेबू- काका सभी जूते फेंकने वाले पुरुष थे। क्या महिलाओं में इतनी हिम्मत नहीं कि वे इस कार्य का बीड़ा उठा सकें।
काका- महिलाएँ तो इस कार्य में बहुत आगे है। वे तो यदा-कदा नेताओं को अपनी चूडि़याँ भेंट कर उन्हें लज्जित कर‍ती ही रहती हैं।

वेबू- काका मगर जो पब्लिसिटी जूता फेंकने से मिली वह अन्य तरीकों से नहीं।
काका- ये तुम्हारा भ्रम है। जूता फेंकने की घटना नई है अत: अधिक कवरेज पा गई। जब ये घटनाएँ आम हो जाएँगी तो कवरेज तभी मिलेगा जब फेंके गए जूते से किसी की मौत हो जाएगी।

वेबू- काका क्या जूता फेंकने की घटनाओं के कोई फायदे भी हैं क्या?
काका- हाँ है ना। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को टीआरपी मिल जाती है, अखबारों को चटपटी खबर। विशेषज्ञों को अपनी टिप्पणियाँ देने का मौका।

आगे चलकर हो सकता है कि इस विषय पर किताबें भी आ जाए। जैसे कि 'हवा में लहराते जूतों से कैसे बचें? किस तरह जूता फेंके कि वार खाली न जाएँ।'

वेबू- काका नेताओं की सिक्योरिटी बढ़ाना पड़ेगी तो क्या देश का खर्च नहीं बढ़ेगा।
काका- इसे यूँ भी तो कह सक‍ते है कि अधिक लोगों को रोजगार मिलेगा।

वेबू- काका सरकार को जूता फेंकने की घटनाओं को हतोस्साहित करने के लिए क्या कदम उठाना चाहिए?
काका- बस जूतों पर भारी भरकम टैक्स लगा देना चाहिए ताकि इंसान उसे फेंकना अफोर्ड न कर सकें।

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