Publish Date: Wed, 21 Oct 2026 (12:26 IST)
Updated Date: Wed, 21 Oct 2026 (13:33 IST)
Papankusha Ekadashi 2026: पापांकुशा एकादशी का नाम दो शब्दों से मिलकर बना है: 'पाप' (अपराध या गलत कार्य) और 'अंकुश' (हाथी को नियंत्रित करने वाला औजार)। इस एकादशी को करने से सभी पापों का नाश होता है और व्यक्ति सद्मार्ग पर चलता है, इसलिए इसे 'पापों पर अंकुश लगाने वाली' एकादशी कहा जाता है। यह एकादशी आश्विन शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आती है। इस बार यह 22 अक्टूबर 2026 को है। इस दिन व्रत, पूजा, दान और श्रीहरि के नाम का जाप करने से जीवन में शुभता और समृद्धि आती है। आइए जानते हैं इसकी कथा और व्रत के फायदों के बारे में विस्तार से...
पापांकुशा एकादशी का व्रत गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026 को रखा जा रहा है और पारण 23 अक्टूबर को द्वादशी तिथि में किया जाएगा।
यहां व्रत की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व की जानकारी निम्नलिखित है:
पापांकुशा एकादशी 2026 की तिथि और शुभ मुहूर्त
पापांकुशा एकादशी व्रत का दिन: गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026
एकादशी तिथि प्रारम्भ: 21 अक्टूबर 2026 को दोपहर 02:11 बजे
एकादशी तिथि समाप्त: 22 अक्टूबर 2026 को 02:47 बजे
व्रत पारण (खोलने) का समय 23 अक्टूबर समय सुबह 06:27 बजे से 08:42 बजे तक
पापांकुशा एकादशी व्रत के फायदे
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पापांकुशा एकादशी के दिन विष्णु के पद्मनाभ रूप की पूजा की जाती है। इस व्रत से सभी प्रकारों के पापों से मुक्ति मिलती है।
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जो व्यक्ति इस एकादशी की रात में जगकर कीर्तन भजन करता है वह स्वर्ग का अधिकारी बनता है। इस दिन व्रत रखने से पुण्य फलों की प्राप्ति होती है और स्वर्ग का मार्ग प्रशस्त होता है।
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पापांकुशा एकादशी का विधि विधान से व्रत और पारण किए जाने से शरीर तथा आत्मा शुद्ध रहते हैं। यह एकादशी अपार धन, समृद्धि और सुख देती है।
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शास्त्रों के अनुसार पापांकुशा एकादशी एक हजार अश्वमेघ तथा सौ सूर्ययज्ञ करने के समान फल प्रदान करने वाली होती है।
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इस दिन जो व्यक्ति सुवर्ण, जल, तिल, भूमि, अन्न, गौ, जूते तथा छाते का दान करता है, उसे यमराज का सामना नहीं करना पड़ता है।
पापांकुशा एकादशी व्रत कथा
धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! आश्विन शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? अब आप कृपा करके इसकी विधि तथा फल कहिए।
भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि हे युधिष्ठिर! पापों का नाश करने वाली इस एकादशी का नाम पापांकुशा एकादशी है। हे राजन! इस दिन मनुष्य को विधिपूर्वक भगवान पद्मनाभ की पूजा करनी चाहिए। यह एकादशी मनुष्य को मनोवांछित फल देकर स्वर्ग को प्राप्त कराने वाली है।
मनुष्य को बहुत दिनों तक कठोर तपस्या से जो फल मिलता है, वह फल भगवान गरुड़ध्वज को नमस्कार करने से प्राप्त हो जाता है। जो मनुष्य अज्ञानवश अनेक पाप करते हैं परंतु हरि को नमस्कार करते हैं, वे नरक में नहीं जाते। विष्णु के नाम के कीर्तन मात्र से संसार के सब तीर्थों के पुण्य का फल मिल जाता है। जो मनुष्य शार्ङ्ग धनुषधारी भगवान विष्णु की शरण में जाते हैं, उन्हें कभी भी यम यातना भोगनी नहीं पड़ती।
जो मनुष्य वैष्णव होकर शिव की और शैव होकर विष्णु की निंदा करते हैं, वे अवश्य नरकवासी होते हैं। सहस्रों वाजपेय और अश्वमेध यज्ञों से जो फल प्राप्त होता है, वह एकादशी के व्रत के सोलहवें भाग के बराबर भी नहीं होता है। संसार में एकादशी के बराबर कोई पुण्य नहीं। इसके बराबर पवित्र तीनों लोकों में कुछ भी नहीं। इस एकादशी के बराबर कोई व्रत नहीं। जब तक मनुष्य पद्मनाभ की एकादशी का व्रत नहीं करते हैं, तब तक उनकी देह में पाप वास कर सकते हैं।
हे राजेन्द्र! यह एकादशी स्वर्ग, मोक्ष, आरोग्यता, सुंदर स्त्री तथा अन्न और धन की देने वाली है। एकादशी के व्रत के बराबर गंगा, गया, काशी, कुरुक्षेत्र और पुष्कर भी पुण्यवान नहीं हैं। हरिवासर तथा एकादशी का व्रत करने और जागरण करने से सहज ही में मनुष्य विष्णु पद को प्राप्त होता है।
हे युधिष्ठिर! इस व्रत के करने वाले दस पीढ़ी मातृ पक्ष, दस पीढ़ी पितृ पक्ष, दस पीढ़ी स्त्री पक्ष तथा दस पीढ़ी मित्र पक्ष का उद्धार कर देते हैं। वे दिव्य देह धारण कर चतुर्भुज रूप हो, पीतांबर पहने और हाथ में माला लेकर गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को जाते हैं।
हे नृपोत्तम! बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था में इस व्रत को करने से पापी मनुष्य भी दुर्गति को प्राप्त न होकर सद्गति को प्राप्त होता है। आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की इस पापांकुशा एकादशी का व्रत जो मनुष्य करते हैं, वे अंत समय में हरिलोक को प्राप्त होते हैं तथा समस्त पापों से मुक्त हो जाते हैं। सोना, तिल, भूमि, गौ, अन्न, जल, छतरी तथा जूती दान करने से मनुष्य यमराज को नहीं देखता।
जो मनुष्य किसी प्रकार के पुण्य कर्म किए बिना जीवन के दिन व्यतीत करता है, वह लोहार की भट्टी की तरह सांस लेता हुआ निर्जीव के समान ही है। निर्धन मनुष्यों को भी अपनी शक्ति के अनुसार दान करना चाहिए तथा धन वालों को सरोवर, बाग, मकान आदि बनवा कर दान करना चाहिए। ऐसे मनुष्यों को यम का द्वार नहीं देखना पड़ता तथा संसार में दीर्घायु होकर धनाढ्य, कुलीन और रोगरहित रहते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हे राजन! जो आपने मुझसे मुझसे पूछा वह सब मैंने आपको बतलाया। अब आपकी और क्या सुनने की इच्छा है?
एक अन्य कथा के अनुसार
पापांकुशा एकादशी की एक अन्य कथा के अनुसार विंध्य पर्वत पर महाक्रूर और अत्यधिक क्रोधन नामक एक बहेलिया रहता था। उसने बुरे कार्य करने में सारा जीवन बिता दिया। जीवन का अंतिम भाग आने पर यमराज ने उसे अपने दरबार में लाने की आज्ञा दी। दूतों ने यह बात उसे समय पूर्व ही बता दी। मृत्यु भय से डरकर वह अंगिरा ऋषि के आश्रम में गया और यमलोक में जाना न पड़े, इस हेतु विनती करने लगा।
अंगिरा ऋषि ने उसे आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन विष्णुजी का पूजन करने की सलाह दी़। इस एकादशी का पूजन और व्रत करने से वह अपने सभी पापों से मुक्त होकर विष्णुलोक को प्राप्त हुआ।