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निर्जला एकादशी को क्यों कहते हैं भीमसेनी एकादशी, साथ में जानिए 2 लाभ

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Nirjala Ekadashi 2021 
 
व्रतों में प्रमुख व्रत होते हैं नवरात्रि के, पूर्णिमा के, अमावस्या के, प्रदोष के और एकादशी के। इसमें भी सबसे बड़ा जो व्रत है वह एकादशी का है। माह में दो एकादशी होती है। अर्थात आपको माह में बस दो बार और वर्ष के 365 दिन में मात्र 24 बार ही नियम पूर्वक व्रत रखना है।
 
ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी निर्जला एकादशी या भीमसेनी एकादशी के नाम से विख्यात है।
 
दो बड़े लाभ
 
1. पद्मपुराण में निर्जला एकादशी व्रत द्वारा मनोरथ सिद्ध होने की बात कही गई है।
 
2. इस एकादशी के व्रत को विधिपूर्वक करने से सभी एकादशियों के व्रत का फल मिलता है।
 
क्यों कहते हैं भीमसेनी एकादशी : पांडव पुत्र भीम के लिए कोई भी व्रत करना कठिन था, क्योंकि भूखे रहना उनके लिए संभव न था। लेकिन वे एकादशी व्रत करना चाहते थे। वेद व्यास व भीष्म पितामह ने भीम को बताया कि वर्ष में मात्र एक बार ज्येष्ठ माह के शुक्लपक्ष की निर्जला एकादशी कर ले तो उन्हें सभी चौबीस एकादशियों (यदि अधिक मास हो तो छब्बीस) का फल मिलेगा। भीमसेन ने यह व्रत रखा था इसीलिए इसका नाम भीमसेनी एकादशी भी हो गया। कुछ क्षेत्रों में इसे पांडव एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।
 
कैसे करते है व्रत : निर्जला का अर्थ निराहार और निर्जल रहकर व्रत करना है। इस दिन व्रती को अन्न तो क्या, जलग्रहण करना भी वर्जित है। यानी यह व्रत निर्जला और निराहार ही होता है। शास्त्रों में यह भी उल्लेख मिलता है कि संध्योपासना के लिए आचमन में जो जल लिया जाता है, उसे ग्रहण करने की अनुमति है।
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