Publish Date: Fri, 30 Oct 2026 (12:36 IST)
Updated Date: Fri, 30 Oct 2026 (12:43 IST)
Dev diwali 2026: देव दिवाली का पर्व परंपरा से लोग देवउठनी एकादशी के दिन मनाते हैं लेकिन असल में यह कार्तिक मास की पूर्णिमा तिथि के दिन रहता है, क्योंकि देवताओं ने तारकासुर के वध के बाद इसी दिन गंगा के तट पर दीपावली का पर्व मनाकर खुशियों मनाई थी। इस दिन नदी के तट पर दीपदान करने से कभी अकाल मृत्यु नहीं होती है और सभी तरह के संकट कट जाते हैं। इस पर यह पर्व 24 नवंबर 2026 मंगलवार के दिन मनाया जाएगा।
पूर्णिमा तिथि प्रारम्भ- 23 नवम्बर 2026 को 23:42 बजे
पूर्णिमा तिथि समाप्त- 24 नवम्बर 2026 को 20:23 बजे
पूर्णिमा के दिन चन्द्रोदय- शाम 17:01 बजे होगा।
कार्तिक पूर्णिमा पर्व और उसका महत्व
कार्तिक पूर्णिमा हिंदू धर्म में एक अत्यंत पवित्र और भव्य पर्व माना जाता है। यह केवल एक दिन का त्यौहार न होकर पाँच दिनों तक चलने वाला एक धार्मिक अनुष्ठान है, जो प्रबोधिनी एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी) से शुरू होकर पूर्णिमा तक मनाया जाता है।
प्रबोधिनी एकादशी से तुलसी विवाह
पाँच दिवसीय उत्सव: कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी से शुरू होकर पूर्णिमा तक यह पर्व पूरे पाँच दिनों तक चलता है।
तुलसी-विवाह का आयोजन: प्रबोधिनी एकादशी से प्रारंभ होने वाले तुलसी विवाह अनुष्ठान का समापन कार्तिक पूर्णिमा के दिन होता है।
शुभ मुहूर्त: शास्त्रों के अनुसार, तुलसी विवाह एकादशी से पूर्णिमा के बीच किसी भी शुभ दिन किया जा सकता है।
पूर्णिमा का महत्व: अधिकांश श्रद्धालु कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही माता तुलसी और भगवान विष्णु के स्वरूप 'भगवान शालिग्राम' का विवाह संपन्न कराते हैं।
भीष्म पंचक (विष्णु पंचक) व्रत
पाँच दिनों का विशेष व्रत: यह व्रत एकादशी से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा को समाप्त होता है।
वैष्णव परंपरा में स्थान: वैष्णव संप्रदाय में कार्तिक महीने के अंतिम पाँच दिनों में रखे जाने वाले इस व्रत का सबसे अधिक धार्मिक महत्व है।
अन्य नाम: भीष्म पंचक व्रत को 'विष्णु पंचक' के नाम से भी जाना जाता है।
देव दीपावली और पौराणिक कथा
देवताओं की दिवाली: कार्तिक पूर्णिमा के दिन ही देव दीपावली मनाई जाती है, जिसे देवताओं के उत्सव के रूप में जाना जाता है।
त्रिपुरासुर का वध: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी दिन भगवान शिव ने 'त्रिपुरासुर' नाम के मायावी राक्षस का वध किया था। इसलिए इस पूर्णिमा को 'त्रिपुरी पूर्णिमा' या 'त्रिपुरारी पूर्णिमा' भी कहते हैं।
स्वर्गलोक का दीप-उत्सव: जब त्रिपुरासुर ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया था, तब भगवान शिव ने उसका अंत किया। इस विजय की खुशी में देवताओं ने पूरे स्वर्गलोक को दीयों से सजाया था।
घाटों पर दीपदान: इसी परंपरा के तहत आज भी कार्तिक पूर्णिमा पर सभी मंदिरों, देवालयों और पवित्र नदियों के घाटों पर हजारों दीप जलाए जाते हैं।