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Life in the times of corona: आखि‍र क्या कर रहा है बुर्ज खलीफा?

नूपुर दीक्षित
मैं बुर्ज खलीफा बोल रहा हूं। नाम तो सुना होगा आपने शायद देखा भी होगा। नजदीक से नहीं, तो तस्वीरों में देखा होगा। मैं हूं इमारतों का सरताज, अरबी में बुर्ज यानी इमारत या बिल्डिंग और खलीफा यानी राजा। तो हुआ ना मैं इमारतों का राजा।

वैसे तो मैं दुबई में रहता हूं लेकिन पूरी दुनिया देख लेता हूं या यूं कहूं कि पूरी दुनिया से लोग मुझे देखने आते हैं, इसी बहाने मैं भी उनसे मिल लेता हूं। नीचे से लेकर मेरी उपरी मंजिल तक रोजाना हजारों लोग मेरे ईर्द-गिर्द घूमते हैं, मेरे साथ तस्वीरें खींचते हैं। दिनभर मेरे ईर्द-गिर्द, उपर नीचे आवाजाही बनी रहती हैं।

मुझे भी आदत सी हो गई है, इन हंसते, मुस्काराते, खिलखिलाते खुशनुमा चेहरों को देखने की। मैं चुप रहता हूं पर वो बोलते हैं, वॉव...,  ऑसम....!

पर कुछ दिनों से मेरे भीतर और बाहर इक सन्नाटा सा पसरा है। अजीब सी शांति छाई हैं। अपने अस्तित्व में आने के बाद से पहली बार मेरे दरवाजे विजिटर्स के लिए बंद हुए हैं। आज अकेले खड़े-खड़े सोचा कि आप से मैं ही बातें कर लूं। सोच रहा हूं कि आप इंसानों की दुनिया में उंचाइयां हासिल करने की जिद कितनी बड़ी हो गई कि आप छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान देना ही भूल गए।

अब एक छोटा सा वायरस आ गया, जो इतना छोटा है कि दिखाई भी नहीं देता पर पूरी दुनिया पर ताला लगवाने की ताकत रखता है। देखो कैसी दहशत मचाई है कि आसमानी उड़ाने रूक गई, आवाजाही रूक गई, लगातार सेल्फी में कैद होने वाले चेहरे अब मॉस्क के पीछे छुप गए।

खुदा करे कि नन्हें से वायरस की शक्ल में आई ये बड़ी सी आफत जल्द से जल्द हमारी दुनिया से बिदा हो जाए। ये आफत आज नहीं तो कल इस दुनिया से बिदा हो ही जाएगी। इसकी बिदाई के बाद भी याद रखना सिर्फ बड़ी और उंची बातों का नहीं बल्कि छोटी बातों का भी। जो दिखाई देती हैं, उनका भी और जो दिखाई नहीं देती है उनका भी।

आपको पता है, प्यार भी दिखाई नहीं देता मगर होता है। उम्मीदें भी दिखाई नहीं देती मगर होती हैं। तसल्ली और सुकून भी ऐसे ही हैं, दिखाई नहीं देते मगर होते हैं। बड़े-बड़े सपनों के पीछे भागते हम कब इन छोटी-छोटी चीजों को पीछे छोड़ देते हैं पता ही नहीं चलता। जब तक एहसास होता है, तब तक वक्त बदल जाता है। वैसे याद दिला दूं कि वक्त भी दिखाई नहीं देता, पर होता है।

जिससे पहले कि दिखाई ना देने वाली कोई छोटी सी चीज आपके बड़ से शरीर में दाखिल होकर कुछ हेर-फेर कर दे, आप दिखाई नहीं देने प्यार को थोड़ा सा वक्त देकर, कुछ नन्हीं उम्मीदों में रंग भरकर, कुछ पल सुकून के बीता लेना क्योंकि उंचा और बड़ा बनने की दौड़ कभी रूकती नहीं।

मुझे पता है कि कुछ सालों बाद दुनिया की सबसे बड़ी इमारत होने का तमगा मेरे पास नहीं रहेगा, जो इमारत मुझसे मेरा तमगा लेगी वो इमारत भी कुछ सालों में किसी दूसरी इमारत के सामने छोटी हो जाएगी। ये सिलसिला लंबा चलेगा। एक-दूसरे को हराने की दौड़ अनंत है और जिंदगी सीमित।

परिस्थितियों ने तुम्हें दौड़ में सुकून का तोहफा दिया है। तो बैठो सुकून से अपने-अपने घर में। किताबों पर जमी धूल झाड़ो, गुड़ियों का घर बनाओ, कागज के रॉकेट को फिर से उड़ा लो, देखो खिड़की पर कोई चिड़िया दाना-पानी का इंतजार तो नहीं कर रही। दौड़ तो एक दिन फिर शुरू होनी ही है और हो ही जाएगी। फिर कभी फुरसत मिले तो मुझसे भी मिलने चले आना।

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