Publish Date: Tue, 02 Feb 2010 (20:41 IST)
Updated Date: Tue, 02 Feb 2010 (20:40 IST)
अब लिंगो लैंग्वेज आधुनिक युवाओं की पंसदीदा भाषा बन गई है। इसके जरिए युवा अँगरेजी के कठिन से कठिन शब्दों को चुटकियों में शार्ट फॉर्म में लिख लेते हैं। इतना ही नहीं ये युवा अपने पैरेंट्स को भी इस तरह की लैंग्वेज सिखाने में जुटे हुए हैं।
लिंग्विस्ट्स के मुताबिक टीनएजर्स की लिंगो लैंग्वेज ने एक नई तरह की भाषा के लिए रास्ता खोल दिया है। हाल ही में हुए एक रिसर्च से पता चला है कि एसएमएस या ऑनलाइन चैटिंग में इस तरह के शब्दों के इस्तेमाल से युवाओं का ब्रेन पॉवर बढ़ता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस तरह के उपयोगी शब्द या संकेत व्यक्ति की शब्द समझने की क्षमता बढ़ाते हैं। टोरंटो यूनिवर्सिटी की इस रिसर्च में कहा गया है कि इस तरह के शब्द ग्रामर खराब नहीं करते बल्कि वर्ड इंटेलिजेंसी पॉवर विकसित करते हैं। मम्मी पापा भी सीख रहे हैं शार्ट मैसेजिंग : इंजीनियरिंग स्टूडेंट माधव अजमेरा कहते हैं कि पापा के पास पिछले 7 सालों से मोबाइल है लेकिन उन्हें मैसेज करते नहीं आता था। पहले मैंने उन्हें मैसेज टाइप करना सिखाया और अब मैं उन्हें शार्ट में अपनी बात लिखना सिखा रहा हूँ। दीप कहते हैं कि पापा भी अब शार्ट लैंग्वेज का इस्तेमाल कर अपने दोस्तों को मैसेज भेजते हैं। अपटेड रहने की वजह से उनका आत्मविश्वास बढ़ा है। ताकि न रहे परिवार के सदस्यों से पीछे : एमबीए स्टूडेंट श्रुति बांगड़ कहती हैं कि हमारे परिवार के अधिकतर सदस्य विदेश में रहते हैं। जो सदस्य देश में रहते हैं वे भी काफी एजुकेटेड व टेक सैवी हैं। वे कहती हैं कि पापा व्यवसायी व मम्मी गृहिणी होने की वजह से उतने अपडेट नहीं हैं। मैं नहीं चाहती कि मम्मी-पापा किसी तरह अन्य सदस्यों से पीछे रहें इसलिए मैं उन्हें एसएमएस के साथ ऑनलाइन चेटिंग में उपयोग होने वाली एब्रीविएशंस, स्माइली आदि सिखा रही हूँ। कुछ पक्ष में : एमबीए स्टूडेंट अजिंक्य कहते हैं कि शॉर्ट मैसेजिंग से समय की बचत के साथ सीमित शब्दों में बात हो जाती है। जब छोटे रूप में अपनी बात कही जा सकती हैं तो फिर बेवजह लंबी चौड़ी बाते लिखने का क्या मतलब है। सिम्मी अरोरा कहती हैं अगर इस तरह की लैंग्वेज का उपयोग नहीं करेंगे तो मिनटों में कही जाने वाली बात को कहने में घंटों लग जाएँगे। जहाँ तक सवाल इसके उपयोग से इंग्लिश खराब होने का है, तो ऐसा कतई नहीं है। अगर लैंग्वेज पर कमांड है तो इससे फर्क नहीं पड़ता कि बात को मूल स्वरूप में लिखा जा रहा है या तोड़- मरोड़कर। ...
तो कुछ विपक्ष में : निजी कंपनी में कार्यरत समीर श्रीवास्तव कहते हैं शार्ट लैंग्वेज का उपयोग करते समय इस बात की भी परवाह नहीं करते कि इससे हमारी ग्रामर और वोकेबलरी दोनों ही खराब हो रही है। बीपीओ में कार्यरत भरत सोनी कहते हैं किसी को मैसेज भेजते समय भले ही उसके केरेक्टर ज्यादा हो जाएँ लेकिन मैं उसे सही इंग्लिश और सही ग्रामर के साथ ही लिखकर भेजता हूँ व सभी को यही सलाह देता हूँ। वे कहते हैं इसकी वजह यह है कि शार्ट मैसेजिंग के उपयोग से जाने अनजाने ही सही लेकिन धीरे धीरे स्पेलिंग के साथ ग्रामर और वोकेबलरी खराब होती जाती है। फेक्ट फाइल : शार्ट मैसेजिंग सर्विस (लिंगो) यानी एसएमएस एक ऐसा जरिया है, जिससे टेलीकम्युनिकेशन प्रोटोकोल पर 160 केरेक्टर्स में मैसेज भेजा जा सकता है। इस ट्रेंड ने नई तरह की भाषा और कम्युनिकेशन के तरीके को जन्म दिया है। इसमें इंग्लिश ही नहीं, हिन्दी के शब्दों का भी जमकर इस्तेमाल हो रहा है।एसएमएस में इंग्लिश को हद से ज्यादा तवज्जो देने के चलते दूसरी कई भाषाओं का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। लैंग्वेज एक्सपर्ट्स का मानना है कि आने वाले समय में दुनिया की करीब 50 फीसदी भाषाएँ खत्म हो जाएँगी।