dharma sangrah

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

'मैं वापस आऊंगा' में दिखेगा बंटवारे का साइलेंट पेन, इम्तियाज अली ने खोले फिल्म को लेकर राज

Advertiesment
Imtiaz Ali interview
हर व्यक्ति की जिंदगी में ऐसा कभी न कभी जरूर कुछ हुआ होता कि उसको लगता है कि अभी कुछ था जो छूट गया, पीछे रह गया और अगर मौका पड़े तो मैं वापस ले आऊं। आप देखेंगे यह चाहे मेरी लाइफ में हो, चाहे आपकी लाइफ में है। ऐसा जरूर होता है। इसलिए फिल्म का नाम 'मैं वापस आऊंगा' ऐसा रखा गया और पार्टीशन की पृष्ठभूमि पर बनाया है तो इसमें एक अलग ही तरीके का ड्रामा जुड़ जाता है। 
 
एक 95 साल का इंसान है, जो बिल्कुल मृत्यु शैया पर लेटा हुआ है। ऐसे में जब जिंदगी को वह सोचता है कि जिंदगी मैंने कैसे जी है तो उसे अचानक से अपने वह पल याद आ जाते हैं जब वह पार्टीशन का हिस्सा बना था। ना चाहते हुए भी अपने गांव अपनी जगह अपना प्यार उसे छोड़कर जाना पड़ता है, लेकिन वह जाते जाते एक वादा करता है कि मैं वापस आऊंगा। और याद रखे उस व्यक्ति को अल्जाइमर्स भी है।
 
यह कहना है इम्तियाज अली का, जिन की फिल्म 'मैं वापस आऊंगा' बहुत जल्द लोगों के सामने होगी। फिर पार्टीशन की कहानी को दिखाने वाली दास्तान है। उनके प्रमोशन के दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए इम्तियाज अली ने कई बातें मीडिया से शेयर कीं। प्रस्तुत हैं बातचीत के अंश।

क्या आप के पास भी ऐसा कुछ है जिसे आप कहना चाहते हैं मैं वापस आऊंगा। 

मुझे लगता है कि मैं अपने बचपन में लौटना चाहूंगा। एक वह जो एक नादानी की अबोध होने की उम्र होती है। वह सिर्फ मैं नहीं हर कोई मिस करता है। समय के साथ जैसे हम बड़े होते जाते हैं। हममें यह चीजें कहीं खोने लग जाती है और हमें उन्हें खो देना भी पड़ता है। मुझे कई बार ऐसा लगता है कि बचपन में मैं कैसा था। 
 
उस जगह पर जाता भी हूं, क्योंकि क्या होता है, बचपन तो नहीं लौटता। लेकिन बचपन की कुछ निशानियां होती है जिससे घर है या फिर दोस्त हैं तो मैं उन घरों में जाता भी हूं। लेकिन फिर भी वहां जाने के बाद भी मैं अपने उस अपने बचपन वाले रूप को मिस करता हूं। मैं जमशेदपुर में बचपन में रहा करता था और वहां पर एक किराए के मकान में हम लोग रहा करते थे। 
 
webdunia

कुछ दर्द है जिन्हें कभी बयां नहीं किया जा सकता है तो ऐसा क्या दर्द आपने देख लिया था जो आपको लगा पार्टीशन पर एक फिल्म बनाऊं। 

मुझे ऐसा लगा क्योंकि मैं ऐसे कई सारे लोगों से मिल चुका हूं जिन्होंने पार्टीशन को खुद अपनी आंखों से देखा है और आज वह 80, 85 से 95 साल के हैं। कुछेक से पंजाब में मिला कुछ बंगाल में जाकर मिला। ये लोग देश भर में फैले हुए कई ऐसे लोगों से मिला। इन्होंने पार्टीशन को देखा है और बंटवारे के दर्द और पीड़ा को सहन किया है। इनमें से कई लोग अपनी याददाश्त भी भूल चुके हैं। कई लोगों को तो यह भी याद नहीं है कि सामने जो लड़का खड़ा है, वह मेरा बेटा है या जो लड़की है। 
 
इनको बस अपना पार्टीशन का वह समय याद आता है। क्योंकि अपना गांव अपना जन्म स्थान छोड़कर दूसरे जगह पर आना पड़ा था। इसलिए मुझे लगा कि मैं यह फिल्म बनाऊं। और अभी इसलिए बनाऊं क्योंकि वह जनरेशन बहुत जल्दी हमें विदा कह कर जा सकती हैं। मैं पंजाब में कई बार जा चुका हूं। अपनी फिल्म चमकीला जब बना रहा था तब तो बिल्कुल गया ही था मैं। मैंने वहां पर कई कहानियां सुनी। इन लोगों से मैं मिला। इनसे मैंने हर घटना को मैं खुद सुना है। यानी हर घटना कहीं ना कहीं किसी की जिंदगी का सच रह चुका है। 
यह कई लोगों की आपबीती का कट एंड पेस्ट मान कर चलिए। मैं सैकड़ों ऐसे लोगों से मिला हूं और एक चीज समझ में आई कि हमने पार्टीशन को या बंटवारे को जिस तरीके से दिखाया है, उसमें चीख-पुकार, रोना मारकाट, हिंसा दुख ये सब दिखाए हैं, लेकिन यह लोग जो सच में बंटवारे को अपनी आंखों से देख चुके हैं। पीड़ा को बयां नहीं करते हैं। अपने दर्द को शेयर नहीं करते हैं, लेकिन इन्हें आज भी जितनी भी इनके पास याददाश्त है। उनको दर्द याद कम आता है। 
 
उनको यह याद आता है कि मैं जहां रहता था, वहां एक घर था। मेरी एक साइकिल हुआ करती थी। मेरा एक कमरा हुआ करता था या पड़ोस में ऐसे कोई लोग रहा करते थे। आपको एक सच्ची घटना बताता हूं। 90 साल की एक महिला थी। मृत्यु शैया पर पड़ी थी लेकिन उन्हें अगर कुछ याद आ रहा था तो वह समय याद आ रहा था जब वह बंटवारे में बॉर्डर पार कर रही थी। और वह बार-बार पुकारती थी। क्या तुमने मेरी गुड़िया संदूक में रख ली या नहीं रखी है। उसे वह गुड़िया याद आती थी। 
 
मैंने देखा हमारे यहां जितनी भी फिल्में बंटवारे पर बनी हुई है, उस में दर्द है, पीड़ा है, हिंसा को दिखाया है जो सही भी है क्योंकि वह हुआ था लेकिन यह भाग भी तो दिखाना बहुत जरूरी है जहां लोगों की यादें कहीं पीछे छूट गई। मैं उन सारे ही लोगों को वह इज्जत वह हमें देना चाहता हूं और बताना चाहता हूं कि हम भले ही आपके उस दर्द को सहन नहीं कर पाए हो। लेकिन हम समझते हैं हम सम्मान देते हैं आपके उस पीड़ा को बुरे समय को जैसे आप गुजर चुके हो।
 
webdunia

आपको पार्टीशन या बंटवारे पर बनी हुई फिल्म याद आती है जो आपके दिल के बड़ी करीब हो 

कुछ साल पहले आई एक सीरीज तमस थी। भीषम साहनी जी ने लिखा था और गोविंद निहलानी जी का निर्देशन था। वह बहुत रोंगटे खड़े कर देने वाली सीरीज हुआ करती थी। उसमें जिस तरीके से पार्टीशन को दिखाया गया है वह मुझे हमेशा से पसंद आया है। दीपा शाही ओमपुरी ऐसे कलाकार रहे हैं, उसमें। और बहुत डरावनी सीरीज रही है वह। 

सोचा ना था आप की पहली फ़िल्म से लेकर आप अभी तक कितने बदले हैं? 

पता नहीं मुझे लगता है। मैं पहले भी उतना ही कंफ्यूज रहता था और आज भी उतना ही कंफ्यूज रहता हूं। प्यार को लेकर यो मुझे हमेशा ही कन्फ्यूजन रहा है। मतलब सोचा ना था, के विरेंद्र हो या फिर हालिया फिल्म की मैं बात कर लूं। मुझे ऐसा लगता है कि जब कोई इमोशन आप अच्छे से समझा ना सके लोगों के बीच में उसे परिभाषित ना कर सके। तो ऐसे में बेहतर है कि मैं उसके ऊपर एक फिल्म बना लूं और एक अलग एंगल से अपने कन्फ्यूजन को लोगों के सामने रख दूं।
 

अपनी फिल्मों में कास्टिंग कैसे करते हैं? 

कास्टिंग तो लिखते समय ही हो जाती है। जब मैं लिखता हूं तो सोचता हूं कि मेरे इस कैरेक्टर में सबसे या अच्छा किरदार कौन अच्छा निभा सकता है। कौन सा एक्टर रोल के लिए सूटेबल रहेगा और फिर उन्हीं के साथ काम करने की कोशिश करता हूं। कई बार यह होता है कि किसी किरदार में अक्सर बहुत अच्छा लगता है। लेकिन लगभग उसी तरह के किरदार में वह काम अच्छा लगता हो। तो यह सब चीजें लिखते टाइम ही मैं निर्धारित कर लेता हूं।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

'कॉकरोच जनता पार्टी को टक्कर देने आई एल्विश यादव की 'खरगोश जनता पार्टी, घोषणापत्र भी जारी किया