Publish Date: Thu, 20 Aug 2026 (08:31 IST)
Updated Date: Wed, 19 Aug 2026 (15:46 IST)
रिलीज के महीने भर पहले से ही बॉलीवुड के गलियारों और बॉक्स ऑफिस की खिड़कियों पर सिर्फ एक ही चर्चा थी, सनी देओल की 'बंटवारा 1947' और इमरान हाशमी की 'आवारापन 2' का महामुकाबला। ट्रेड पंडितों और सिनेप्रेमियों ने 'बंटवारा 1947' को रेस में आगे रखा था। वजह भी साफ थी, 'घायल' और 'दामिनी' जैसी ब्लॉकबस्टर देने वाली राजकुमार संतोषी और सनी देओल की जोड़ी पूरे 30 साल बाद रुपहले पर्दे पर वापसी कर रही थी।
दूसरी ओर, इमरान हाशमी की 'आवारापन 2' का अपना एक अलग अंडरग्राउंड क्रेज था, लेकिन आम धारणा यही थी कि पहले वीकेंड में सनी देओल का हथौड़ा इमरान के रोमांस और थ्रिल पर भारी पड़ेगा। लेकिन जब एडवांस बुकिंग के आंकड़े सामने आए, तो हवा का रुख बदल चुका था। 'आवारापन 2' ने जो बढ़त बनाई, वो रिलीज के बाद एक सुनामी में बदल गई। दिलचस्प बात यह है कि 'बंटवारा 1947' को ज्यादातर फिल्म समीक्षकों ने सराहा, लेकिन सिनेमाघरों में यह फिल्म दर्शकों को तरस गई।
आखिर इतनी बड़ी स्टारकास्ट और दिग्गज निर्देशक के बावजूद यह फिल्म क्यों औंधे मुंह गिरी? यहां यह बात स्पष्ट की जाती है कि यह बॉक्स ऑफिस के नजरिए से बात की जा रही है। इसके पीछे ये 5 बड़े कारण साफ नजर आते हैं:
1. सनी देओल की एक्शन इमेज से खिलवाड़
सनी देओल का नाम जेहन में आते ही एक ऐसे एंग्री यंग मैन की तस्वीर उभरती है, जो अपने ढाई किलो के हाथ से दुश्मनों के छक्के छुड़ा देता है। विशेषकर पाकिस्तान के खिलाफ बनी फिल्मों (गदर, बॉर्डर) में दर्शकों ने उनके आक्रामक अवतार को सिर आंखों पर बिठाया है। लेकिन 'बंटवारा 1947' में उनका किरदार उनकी इस हार्डकोर एक्शन इमेज के बिल्कुल विपरीत था। एक शांत और संयमित सनी देओल उनके उन कट्टर फैंस को बिल्कुल रास नहीं आया, जो थिएटर्स में सीटियां और तालियां बजाने गए थे।
2. मौजूदा माहौल से कटी हुई कहानी
सिनेमा हमेशा समाज का आइना होता है और दर्शक उसी फिल्म से जुड़ते हैं जो उनके मौजूदा मूड से मेल खाती हो। वर्तमान समय में भारत में पाकिस्तान के खिलाफ एक खास तरह का आक्रामक माहौल और राष्ट्रवाद की लहर है। ऐसे दौर में 'बंटवारा 1947' जैसी एक गंभीर, शांत फिल्म देखना दर्शकों की पहली पसंद नहीं था। दर्शक इस विषय पर वही पुराना 'तारा सिंह' वाला एग्रेशन देखना चाहते थे।
3. 150 करोड़ का बेतहाशा बजट
ऐतिहासिक या गंभीर विषयों पर आधारित फिल्मों का अपना एक सीमित दर्शक वर्ग होता है। ऐसी फिल्में अगर नियंत्रित बजट में बनाई जाएं, तो वे आसानी से अपनी लागत निकाल कर हिट हो सकती हैं। लेकिन 'बंटवारा 1947' के मेकर्स ने इसके प्रोडक्शन पर लगभग 150 करोड़ रुपये पानी की तरह बहा दिए। एक 'आर्ट-हाउस' या 'गंभीर' फिल्म के लिए बॉक्स ऑफिस से इतनी भारी भरकम रकम वसूलना लोहे के चने चबाने जैसा था।
4. युवाओं से कनेक्ट होने में पूरी तरह नाकाम
आज के समय में सिनेमाघरों में जाकर फिल्म देखने वाला 70 से 80 प्रतिशत दर्शक 25 वर्ष से कम उम्र का है। इस जेनरेशन (Gen-Z) को सिनेमाघरों तक खींचने के लिए फिल्म में युवा स्टार्स और ट्रेंडी ट्रीटमेंट की जरूरत होती है। 'बंटवारा 1947' में ऐसा एक भी युवा सितारा नहीं था जो इस दर्शक वर्ग को अपनी ओर खींच पाता। फिल्म का भारी-भरकम विषय और ट्रीटमेंट भी युवाओं के मिजाज के अनुरूप नहीं था, जिसके चलते यूथ ने इस फिल्म से पूरी तरह दूरी बनाए रखी।
5. पुराना निर्देशन और बेअसर संगीत
फिल्म की एक बड़ी यूएसपी (USP) इसका संगीत और निर्देशन था, जो अंततः इसकी सबसे बड़ी कमजोरी साबित हुआ। संगीत की जिम्मेदारी ऑस्कर विजेता एआर रहमान के कंधों पर थी, लेकिन उनका संगीत दर्शकों की उम्मीदों पर बिल्कुल खरा नहीं उतरा और फिल्म में एक भी ऐसा गाना नहीं था जो चार्टबस्टर बन पाता। राजकुमार संतोषी का डायरेक्शन आज की फास्ट-पेस ऑडियंस को 90 के दशक जैसा लगा। आज के दौर के तेजतर्रार सिनेमाई ग्रामर के आगे उनका यह पुराना स्टाइल दर्शकों को बांधे रखने में विफल रहा।
अंततः, समीक्षकों की तारीफों के बावजूद, गलत बजटिंग, पुरानी सोच और दर्शकों की नब्ज न पकड़ पाने के कारण 'बंटवारा 1947' बॉक्स ऑफिस के इतिहास में एक बड़ी असफलता के रूप में दर्ज हो गई।
About Writer
समय ताम्रकर
समय ताम्रकर फिल्म समीक्षक हैं, जो फिल्म, कलाकार, निर्देशक, बॉक्स ऑफिस और फिल्मों से जुड़े पहलुओं पर गहन विश्लेषणात्मक लेख लिखते हैं।....
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