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BBC EXCLUSIVE: 'केरल में बाढ़ नहीं है, नदियों के आंसू हैं'

Webdunia
सोमवार, 20 अगस्त 2018 (12:39 IST)
- प्रमिला कृष्णन (बीबीसी तमिल संवाददाता)
 
"केरल में बाढ़ नहीं आई है बल्कि ये यहां की 44 नदियों के आंसू हैं।" ये कहना है राजेंद्र सिंह का, जिन्हें प्यार से ' भारत का वॉटर मैन' कहा जाता है।
 
 
'वॉटर मैन' इसलिए क्योंकि उन्होंने कई मृत नदियों को दोबारा ज़िंदा कर भारत में एक तरीके की 'जल क्रांति' ला दी थी। इस 'वॉटर मैन' का ताल्लुक भारत के रेगिस्तानों वाले सूबे यानी राजस्थान से है। राजेंद्र सिंह रैमन को एशिया का नोबेल पुरस्कार कहे जाने वाले रेमन मैग्सेस अवॉर्ड और अनाधिकारिक तौर पर 'पानी का नोबेल प्राइज़' कहे जाने वाले स्टॉकहोम वॉटर प्राइज़ से भी सम्मानित किया जा चुका है।
 
 
'केरल सरकार मुझे भूल गई'
दिलचस्प बात ये है कि साल 2015 में केरल सरकार ने राजेंद्र सिंह को वहां की मृतप्राय नदियों को ज़िंदा करने के लिए एक स्कीम बनाने के लिए आमंत्रित किया था।
 
 
राजेंद्र बताते हैं, "वहां एक बैठक हुई जिसमें मंत्री और कई बड़े अधिकारी शामिल थे। हमने बैठक में नदियों को बचाने, बाढ़ रोकने और कई दूसरे मुद्दों पर चर्चा की। उस वक़्त नदियों को बचाने के लिए एक बिल का ड्राफ़्ट बनाना तय हुआ था। इसके लिए उन्होंने मेरी राय मांगी थी। मैंने बिल के लिए कई ज़रूरी मुद्दों की लिस्ट बनाकर उन्हें दी थी। लेकिन लगता है कि वो मुझे भूल गए।"
 
'हर नदी का अपना स्वभाव होता है'
राजेंद्र सिंह नदियों के प्रवाह रोकने वाली सभी रोड़ों और अतिक्रमण को हटाने पर ज़ोर देते हैं। इसके साथ ही वो कहते हैं, "हर नदी का अपना एक अलग स्वभाव होता है। सभी नदियों को बचाने का कोई एक तय तरीका नहीं है। केरल की बात करें तो यहां कि 44 नदियों के रास्ते से अतिक्रमण हटाया जाना चाहिए और एक 'कन्ज़र्वेशन ज़ोन' बनाया जाना चाहिए।"
 
 
उन्होंने कहा, "मैं ज़ोर देकर कहता हूं कि शुरुआत उन आवासों और कारखानों को हटाकर करनी चाहिए जो नदियों को दूषित करते हैं। केरल में जंगलों की कटाई और रेत की चोरी धड़ल्ले से हो रही है। मैंने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर कड़े कदम उठाने में देरी की गई तो इसके ख़तरनाक नतीजे होंगे।"
 
 
ऐसे ही चलता रहा तो...
राजेंद्र का मानना है कि अगर राजस्थान में केरल के आधी नदियां भी होतीं तो राजस्थान यह एक समृद्ध और शांत राज्य होता। उन्होंने कहा, "हमने सुख-समृद्धि लाने वाली नदियों को बाढ़ लाने वाली नदियों में बदल दिया है। अगर यही हालत रही तो केरल में कभी बाढ़ और कभी सूखा देखने को मिलेगा। कोई भी नदी को इसकी मनमर्जी से बहने से नहीं रोक सकता।"
 
राजेंद्र का कहना है कि वो एक बार फिर केरल सरकार की मदद करने के लिए तैयार हैं।
 
 
'यह नीतियों पर बात करने का वक़्त नहीं है'
बीबीसी ने इस बारे में केरल जल प्रबन्धन विभाग के अधिकारी जेम्स विल्सन से भी बात की और पूछा कि नदियों को बचाने के मक़सद से बनाया गया बिल कभी सामने क्यों नहीं आया।
इसके जवाब में उन्होंने कहा, "इस वक़्त हम अभूतपूर्व बाढ़ से जूझ रहे हैं। ये नीतियों के बारे में बात करने के लिए सही वक़्त नहीं है। हां, राजेंद्र सिंह यहां आए थे और उन्होंने बिल के ड्राफ़्ट के लिए अपने सुझाव भी दिए थे। हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हर उस चीज़ को लागू करना मुमकिन नहीं है, जिसकी चर्चा हुई।"
 
'लोगों को हटाना ठीक नहीं होगा'
विल्सन ने नीतियों में राजनीतिक दखल के बारे में भी बात की। उन्होंने कहा, "केरल में ज़मीन पहले से ही कम है। लोग कई पीढ़ियों से नदियों के किनारे रहते आ रहे हैं। यहां कई जगहों पर घर और नदी अगल-बगल में होते हैं। लोगों को इन जगहों से हटाना आसान काम नहीं है। वो तुरंत नेताओं के पास चले जाएंगे और विरोध प्रदर्शन होने लगेंगे।''
 
 
विल्सन का मानना है कि जिन जगहों पर लोग बरसों से रहे हैं, उन्हें वहां से हटाना ठीक नहीं होगा। उन्होंने कहा, ''नदियों के पास धार्मिक स्थल भी हैं। यह एक संवेदनशील मुद्दा है जिसे बेहद संजीदगी और सतर्कता से देखने की ज़रूरत है।"
 
 
केरल में बढ़ती आबादी और खुली जगहों पर निर्माण कार्यों के ज़िक्र पर विल्सन ने कहा कि केरल में हर साल बाढ़ आती है लेकिन इस साल यह बहुत ज़्यादा है। उन्होंने कहा, ''हम चाहे जितनी भी सावधानी बरत लें, हर 50 या 100 सालों में ऐसी आपदा आएगी। हमने समझ लिया है कि नदियों को फिर से ज़िंदा करने की ज़रूरत है। एक बार बाढ़ ख़त्म हो जाए, फिर हर मुमकिन समाधान के बारे में सोचा जाएगा।"
 

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