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कर्नाटक के वे मराठी भाषी, जो महाराष्ट्र में शामिल होना चाहते हैं

Webdunia
गुरुवार, 10 मई 2018 (19:27 IST)
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- मयूरेश कोण्णूर
 
स्वतंत्रता मिलने के बाद देश में भाषा के आधार पर राज्यों का निर्माण होने के 61 साल बाद भी क्या भाषा के मुद्दे पर चुनाव लड़े जा सकते हैं? कर्नाटक में ऐसा होता है। महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच आज भी सीमावर्ती इलाकों में फंसे चार ज़िलों के 12 पंचायत क्षेत्रों और 865 गांवों को लेकर क़ानूनी लड़ाई जारी है।
 
 
उत्तर कर्नाटक के इन विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव आज भी मराठी बनाम कन्नडिगा लड़े जाते हैं। इस घमासान के केंद्र में है मराठी बहुल बेलगांव, जो अब कर्नाटक की उपराजधानी है। कर्नाटक सरकार ने इसका नाम बदलकर बेलगांवी कर दिया है। बेलगांव शहर को राजधानी बेंगलुरु के बाद कर्नाटक का दूसरा सबसे बड़ा शहर माना जाता है।
 
 
इस शहर के उत्तरी और दक्षिणी विधानसभा क्षेत्रों के साथ ज़िले में दो और विधानसभा क्षेत्र ऐसे हैं, जहां मराठी बनाम कन्नडिगा की लड़ाई रहती है। ये चुनाव क्षेत्र हैं- बेलगांव ग्रामीण और खानापुर दो।
 
इन चारों विधानसभा क्षेत्रों की लगभग 60 प्रतिशत मराठी भाषी आबादी इस सीमावर्ती इलाके को महाराष्ट्र में ले जाने के लिए आंदोलन कर रही है। 'महाराष्ट्र एकीकरण समिति' यहां इस मामले में मराठियों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व करती है मगर भाजपा और कांग्रेस इसके विरोध में हैं। बेलगांव के साथ साथ ही निपाणी, बीदर, कारवार और वीजापुर ऐसे ज़िले हैं जहां मराठी मतदाताओं की चुनाव में ख़ासी अहमियत रहती है।
 
 
कब से है विवाद
इस लड़ाई की जड़ें साल 1956 तक जाती हैं, जब भारत में भाषा के आधार पर राज्यों का गठन किया गया था। देश के आज़ाद होने के बाद बेलगांव बॉम्बे स्टेट का हिस्सा बना। लेकिन साल 1956 में जब भाषा के आधार पर नए राज्य बने, तब कई आंदोलन हो रहे थे। जब महाराष्ट्र बन रहा था बेलगांव को 'संयुक्त महाराष्ट्र' में शामिल करने की मांग की जा रही थी।
 
उस समय बॉम्बे पर गुजरात भी हक़ जता रहा था और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इसे केंद्र शासित प्रदेश रखने पर विचार कर रहे थे। उस समय एसएम जोशी, आचार्य अत्रे और प्रबोधनकार ठाकरे जैसे अलग-अलग विचारधाराओं के नेता साथ आकर 'संयुक्त महाराष्ट्र' का आंदोलन चला रहे थे।
 
 
आखिरकार बॉम्बे (आज मुंबई) को नवनिर्मित महाराष्ट्र राज्य की राजधानी बना दिया गया और मगर बेलगांव समेत निपाणी, भालकी, बिदर, कारवार, धारवाड और हुबली जैसे मराठी भाषी बहुल प्रांत मैसूर स्टेट (जो 1973 में कर्नाटक बना) में रह गए। तभी से बेलगांव समेत 865 गांव महाराष्ट्र में जाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।
 
आज भी जारी है आंदोलन
इस आंदोलन के लिए 'महाराष्ट्र एकीकरण समिति' की स्थापना की गई। विवाद को देखते हुए केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र की मांग पर 1957 में महाजन समिति गठित की, लेकिन यह समिति कोई भी हल नहीं ढूंढ पाई।
 
 
मुद्दा और गरमाता गया और स्वतंत्रता सेनानी रहे सेनापती बापट ने बेलगांव समेत 865 गांव महाराष्ट्र में शामिल करने के लिए उपवास शुरू कर दिया। तब 1966 में केंद्र सरकार ने फिर से महाजन आयोग गठित किया। इस आयोग ने बेलगांव को कर्नाटक में ही रखा और कर्नाटक के 264 गांव महाराष्ट्र को दे दिए।
 
महाराष्ट्र सरकार ने यह सुझाव नकार दिया। इसके बाद दशकों से ये विवाद महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच बना हुआ है। इस सीमावर्ती इलाके में रहेनेवाले मराठी भोलने वाले हमेशा कर्नाटक सरकार की तरफ से अन्याय का दावा करते ओपि। कन्नड़ भाषा की सख्ती के खिलाफ यहां हमेशा आंदोलन होते रहे हैं।
हिंसा भी हो चुकी है
'महाराष्ट्र एकीकरण समिति' और 'कन्नड़ रक्षण वेदिके' जैसे संगठनों के बीच का विवाद हिंसा तक भी पहुंच चुका है। दोनों राज्यों में कई सरकारें आईं और वे बेलगांव पर दावा जताती रहीं। 2006 में महाराष्ट्र सरकार कर्नाटक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट भी गई थी।
 
 
इसे देखते हुए कर्नाटक ने 2006 में बेलगांव को उपराजधानी का दर्जा दे दिया और यहां 'सुवर्णसौध' बनाकर कर्नाटक विधानसभा के सत्रों का आयोजन भी शुरू कर दिया। इस बीच कर्नाटक सरकार ने बेलगांव का नाम बदलकर 'बेलगांवी' कर दिया। इसे लेकर भी आंदोलन हुए। आज भी बेलगांव और सीमावर्ती इलाक़े को लेकर महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई जारी है।
 
राजनीति
भाषा संबंधित अधिकारों के आंदोलन के लिए स्थापित की गई 'महाराष्ट्र एकीकरण समिति' राजनीतिक आंदोलन में भी शामिल रही। साल 1956 के बाद कई साल उत्तर कर्नाटक के इस प्रांत से सात विधायक मराठी भाषी चुने जाते थे। बेलगांव के साथ साथ कारवार, निप्पाणी, भालकी, बिदर और बीजापुर चुनावक्षेत्रों में मराठियों का बोलबाला था।
 
 
आज भी यहां की स्थानीय इकाइयों में मराठी प्रतिनिधि ज्यादा होते हैं। 'महाराष्ट्र एकीकरण समिति' ही नहीं, भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दल भी मराठी उम्मीदवार उतारते हैं। बेलगांव नगर निगम में हमेशा से मराठी भाषियों का वर्चस्व रहा है। आज भी इस नगर निगम में कुल 58 में से 33 पार्षद मराठी हैं।
 
मगर विधानसभा की बात करें तो मराठियों का प्रतिनिधित्व कर रही 'महाराष्ट्र एकीकरण समिति' का वर्चस्व राजनीति में कम होता गया। कभी कर्नाटक विधानसभा में सात एमएलए भेजने वाली 'समिति' आज सिर्फ चार विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ती है। 2013 में उनके सिर्फ़ 2 एमएलए चुने जा सके।
 
 
इस बार तो हालात ज़्यादा गंभीर है क्योंकि मराठियों को इकट्ठा करने वाली इस समिति में गुटबाजी के कारण दरार आ गई है। जानकार मानते हैं कि संभव है कि मराठी वोट इस बार गुटों में बिखर जाएं।
 
कैसे आई दरार
सीमावर्ती इलाकों में सभी पंचायतों में काम करने वाली 'महाराष्ट्र एकीकरण समिति' की अलग-अलग शाखाओं में अनुशासन के लिए 'मध्यवर्ती महाराष्ट्र एकीकरण समिति' बनाई गई। मगर इसके केंद्रीय संगठन में ही अलग-अलग गुट बन गए हैं। 'तरुण भारत' पत्रिका के प्रमुख किरण ठाकुर जिसका नेतृत्व करते हैं, वह 'बेलगांव शहर महाराष्ट्र एकीकरण समिति' अब अलग चुनाव लड़ रही है।
 
 
वहीं 'मध्यवर्ती समिति' दीपक दलवी के नेतृत्व में चुनाव लड़ रही है। ज़ाहिर है कि लड़ाई अब मराठी बनाम मराठी हो गई है। किरण ठाकुर ने 'बीबीसी' से कहा, "जो कभी चुनाव जीत नहीं पाए हैं, वे अब चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं। लेकिन सीमावर्ती जनता को यह बात मान्य नहीं है। सारे मराठी भाषी हमारे साथ हैं, फिर भी वह ऐसी हरकत कर रहे हैं। लेकिन हमारे उम्मीदवार ही जीत कर आएंगे। चुनाव आ गए तो अपने भी स्वार्थी बन जाते हैं। मराठी मतदाताओं में कोई दरार नहीं आएगी और सब हमारे साथ खड़े रहेंगे।"
दरार को पाटने की कोशिश
ठाकुर के ख़िलाफ़ हो गए गुट का नेतृत्व कर रहे 'मध्यवर्ती समिति' के दीपक दलवी का भी कहना है कि इस गुटबाज़ी के बावजूद मराठी मतदाताओं में एकता कायम रहेगी और सब उनके साथ खड़े रहेंगे।
 
 
उन्होंने कहा, "सामान्य मराठी आदमी हमारे साथ खड़ा है। ठाकुर ने उच्च वर्ग का नेता और सामान्य कार्यकर्ता, ऐसे दो गुट यहां बनाए। इसी वजह से सभी उनसे नाराज़ हैं। वह सत्ता के लिए लड़ते हैं और हम न्याय के लिए लड़ते हैं। कर्नाटक के प्रशासन से दोस्ती कर हमें न्याय नहीं मिलेगा। हमारी तो जंग उनके ख़िलाफ़ है।"
 
'महाराष्ट्र एकीकरण समिति' में आई इस दरार को पाटने की कोशिश 'एनसीपी' के अध्यक्ष शरद पवार ने भी की लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। 31 मार्च को पवार खुद बेलगांव आए थे।
 
 
उन्होंने वहां से किए ट्वीट में लिखा, "कर्नाटक के इस चुनाव पर सारे देश की निगाहें है। ऐसे समय 'समिति' के सारे नेताओं ने एकजुट होकर अगर अपने उम्मीदवार दिए तो ज़्यादा मराठी विधायक चुनकर आ सकते हैं। मतभेद भूलकर सब को एक होना चाहिए, तभी न्यायालय में बेलगांव का पक्ष अधिक मज़बूत होगा।" मगर इस अपील का कोई असर नहीं हुआ।"
 
क्या असर होगा
राजनीतिक विश्लेषकों और पत्रकारों को लगता है कि इसका असर मराठी विधायक चुने जाने पर ज़रूर पड़ेगा। सर्जू कातकर वरिष्ठ पत्रकार हैं। वो कहते हैं, "मुझे नहीं लगता की इस बार 'समिति' का कोई मराठी विधायक चुनकर आएगा। इन दो गुटों के अलावा और भी बहुत सारे निर्दलीय उम्मीदवार चुनाव में खड़े हैं। इसलिए मराठी मतदाता भ्रम में हैं। बहुत सारे, ज़्यादातर युवा मतदाताओं को यह लगता है कि जिस मामले को लेकर यह राजनीति की जाती है, वह मामला अब सुप्रीम कोर्ट में है तो फिर उस मुद्दे पर अपना वोट क्यों बर्बाद करें।"
 
 
इस गुटबाजी से जो असर होगा वह तो नतीजों में दिखाई देगा, लेकिन क्या उत्तर कर्नाटक के इस हिस्से में मराठियों का राजनीतिक वर्चस्व कम होना पहले ही शुरू हो गया था? या फिर यह नई बात है?
 
बेलगांव के मेयर रहे मालोजी अष्टेकर बताते हैं, "इसके कई कारण हैं। यहां की स्थानीय इकाईयों में आज भी मराठी वर्चस्व है। राष्ट्रीय दल भी यह जानते हैं। लेकिन कई सालों से विधानसभा चुनाव क्षेत्रों के सीमा निर्धारण (परिसीमन) किए गए हैं। बेलगांव शहर के दो हिस्से हो गये। बाकी इलाकों में भी जहां मराठी वोटर ज़्यादा थे, सारे बंट गए। और इसकी वजह से हमारे विधायक कम होते गए।"
 
 
"दूसरी बात यह कि यहां पर कर्नाटक सरकार के अनेक कार्यालय बनाए गए हैं। बेलगांव की एक्स्टेंशन सिटी बनी है। उसकी वजह से यहां पर कन्नड़ भाषियों की संख्या भी बढ़ गई। एक और अहम मुद्दा यह है कि बहुत सारे मराठी युवा हिंदुत्व की लहर में बजरंग दल और श्रीराम सेना जैसे संगठनों की तरफ़ हो गए। इसका फायदा यहां भाजपा को हुआ।"
 
मुद्दा कितनी अहमियत रखता है
अष्टेकर बताते हैं कि बेलगांव में भाजपा के एक विधायक हैं और सांसद भी भाजपा के ही हैं। सवाल अब यह है कि महाराष्ट्र-कर्नाटक सीमा के विवाद पर सालों से चल रहा यह राजनीतिक युद्ध इस चुनाव में क्या रंग दिखाएगा। 'बीबीसी' ने बेलगांव के कुछ युवाओं से भी पूछा कि उनकी पीढ़ी के लिए यह सालों से चला आ रहा मुद्दा कितनी अहमियत रखता है। इस पर युवाओं की राय बंटी हुई है।
 
 
संकेत कुलकर्णी फिल्ममेकर हैं और उनकी एक फिल्म 'कान फिल्म फेस्टिवल' तक पहुंच गई है। उनके दादाजी भी इस आंदोलन में शामिल थे, मगर संकेत की राय अब अलग है। वह कहते हैं, "मेरी और मुझसे पहली पीढ़ियों में मतभेद है। मुझे नहीं लगता यह मुद्दा अब कुछ भी अहमियत रखता है।"
 
मगर पीयूष हावल का कहना है कि वह इस आंदोलन के पक्ष में है। वह एक फ़ेसबुक ब्लॉगर है और आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए मुंबई की नौकरी छोड़ बेलगांव वापस आए है। पीयूष कहते हैं, "इस आंदोलन में आज भी हजारों युवा कार्यकर्ता शामिल हैं। हमें लगता है कि बेलगांव महाराष्ट्र में ही जाना चाहिए। भाषा जीने का आधार है। अगर वह आधार ही चला जाए तो कैसे होगा? इसीलिए हम लड़ रहे हैं।"

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