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कर्नाटक चुनाव: किसके साथ है कर्नाटक का मुसलमान

Webdunia
शुक्रवार, 4 मई 2018 (12:07 IST)
- इमरान क़ुरैशी
 
कर्नाटक चुनाव में भी भारतीय जनता पार्टी ने मुसलमानों से दूरी बनाए रखने वाली पुरानी नीति अपनाई है। यही वजह है कि इस समुदाय के पास अब कांग्रेस और जनता दल सेक्यूलर (जेडीएस) के बीच किसी एक को चुनने का विकल्प बचा है। अब राय ये बन रही है कि मुसलमान कांग्रेस के हक़ में गोलबंद हो रहे हैं लेकिन समुदाय में कुछ लोग जाति और धर्म की परवाह किये बग़ैर जनता दल सेक्यूलर के भरोसेमंद प्रत्याशियों को भी वोट दे सकते हैं।
 
पूर्व विधायक और राजनैतिक विश्लेषक अरशद अली कहते हैं, "ये विकल्प भी सिर्फ़ दक्षिण कर्नाटक के ज़िलों में है, जहां कांग्रेस और जेडीएस के बीच लगभग सीधी टक्कर है। उत्तर, तटीय इलाकों और मध्य कर्नाटक के ज़िलों में 150 सीटें हैं जहां जेडीएस की मौजूदगी न के बराबर है।"
 
कांग्रेस के साथ?
कर्नाटक में मुसलमानों की चुनावी स्थिति पर किताब लिखने वाले अरशद अली आगे कहते हैं, "आम तौर पर मुसलमान राष्ट्रीय हालात को परख कर अपना वोट देते हैं। उनकी बड़ी चिंता सुरक्षा है। 2014 से ये साफ़ हो गया है कि मुसलमान डरे हुए हैं। अगर कोई ऐसा उम्मीदवार है जो बीजेपी को हरा सकता है तो वे उसे वोट देंगे, फिर चाहे वो आज़ाद प्रत्याशी ही क्यों न हो।"
 
कर्नाटक की 6.1 करोड़ आबादी में 12 फ़ीसदी मुसलमान हैं। 60 सीटों पर इनकी मौजूदगी काफ़ी अहम है। कांग्रेस ने 17 और जेडीएस 20 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिए हैं। पॉपुलर फ़्रंट ऑफ़ इंडिया के सियासी धड़े सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया ने भी कई सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं।
 
ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुलसमीन के मुखिया असदुद्दीन औवेसी ने भी घोषणा की थी कि उनकी पार्टी हैदराबाद-कर्नाटक क्षेत्र में 60-70 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े करेगी। लेकिन आख़िर में पार्टी ने अपने उम्मीदवार न उतार कर जेडीएस का समर्थन करने की ठानी है।
 
विधान परिषद के सदस्य और राज्य में यूथ कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष रिज़वान अरशद कहते हैं, "कर्नाटक का मुसलमान उत्तर प्रदेश या बिहार के मुसलमान से अलग है। यहां का मुसलमान मुख्यधारा से जुड़ा हुआ है और वो अन्य समुदायों के साथ मिलकर फ़ैसला करेगा कि किसे वोट दिए जाए। मिसाल की तौर पर इस बार निर्णय ओबीसी, दलित, लिंगायत और वोकालिगा समुदायों के साथ मिलकर वोट डालने का हुआ है।"
 
ध्रुवीकरण कामयाब नहीं
रिज़वान आगे बताते हैं, " बीजेपी इसलिए भी है ध्रुवीकरण की कोशिश नहीं कर रही है क्योंकि अन्य समुदाय एकजुट हैं।" कांग्रेस के रिज़वान और जेडीएस के तनवीर अहमद, दोनों ही मानते हैं कि मुसलमान उन्हीं की पार्टी को वोट देंगे।
 
तनवीर अहमद कहते हैं, "मुसलमानों का वोटिंग पैटर्न होता है। उनका मत देने का तरीका काफ़ी सुनियोजित होता है। ये इस बात पर निर्भर करता है कि उनके रिश्ता किसके अज़माया हुआ है।" लेकिन मैसूर यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के प्रोफ़ेसर मुज़्ज़रफ़र असादी के पास कर्नाटक के मुसलमान मतदाताओं को लेकर अलग है आकलन है।
 
एक साथ वोट
प्रोफ़ेसर असादी कहते हैं, "इस बार अल्पसंख्यक एक झुंड की तरह वोट देंगे। इसके तीन कारण हैं। पहला ये कि सिद्धारमैया सरकार पहले की तरह उनकी हिफ़ाज़त करेगी। दंगे तो नहीं लेकिन तटीय इलाकों में सांप्रदायिक तनाव रहा है। दूसरा जेडीएस और मुसलमानों के बीच भरोसे की कमी रही है क्योंकि पार्टी ने 2006 में बीजेपी के साथ गठबंधन सरकार चलाई थी। "
 
"तीसरी वजह है बीजेपी का मुसलमानों को उम्मीदवार न बनाना। एक उम्मीदवार भी मुसलमानों के फ़ैसले पर असर डाल सकता था। ये हिंदुत्व की राजनीति है। कर्नाटक के मुसलमानों की समस्या ये है कि यहां यूपी या बिहार की तरह कोई मज़बूत क्षेत्रीय दल नहीं है।"
 
अलग-अलग चाल
कांग्रेस के एमएलसी रिज़वान कहते हैं, "आप इस संभावना से इंकार नहीं कर सकते कि मुसलमान दलगत राजनीति से ऊपर उठकर किसी असाधारण उम्मीदवार का साथ दे सकते हैं।"
 
तो रामनगरम से चुनाव लड़ रहे जेडीएस नेता एचडी कुमारास्वामी जैसे उम्मीदवार सारे मुसलमानों का वोट हासिल कर सकते हैं। लेकिन इसी के पड़ोस में स्थित चन्नापटना में ये शायद संभव न हो। ये दूसरी सीट है जहां कुमारास्वामी चुनाव मैदान में हैं।
 
प्रोफ़ेसर असादी कहते हैं, "कुमारास्वामी के मुसलमानों से रिश्ते दोस्ताना हैं। तो ये कोई हैरानगी की बात नहीं होगी। लेकिन शिकारीपुरा में बीजेपी के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार बीएस येदियुरप्पा मुसलमानों और कुरुबा समुदाय, दोनों के वोट पाएंगे क्योंकि उनकी उस विधान सभा सीट पर गहरी पैठ है।"

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