Hanuman Chalisa

एक ऐसा गेम जिसने उड़ा दी है मांओं की नींद!

Webdunia
शुक्रवार, 1 सितम्बर 2017 (12:43 IST)
आजकल के बहुत से बच्चों की तरह मेरी भतीजी भी बड़े आराम से एंड्रॉयड मोबाइल यूज़ कर लेती हैं। वो 7 साल की है। बच्चे मोबाइल फ्रेंडली हैं इसलिए जब वो बेबी गेम डाउनलोड करती थी तो हम ज्यादा ध्यान नहीं देते थे। उस दिन जब वो स्कूल से आई तो उसने अपनी मां से 'ब्लू' की स्पेलिंग पूछी। थोड़ी देर बाद 'व्हेल' की। मां को लगा उसने ऐसे ही पूछ लिया होगा।
 
रात में उसने पूछा, 'बुआ ये ब्लू व्हेल गेम क्या है?' उसके मुंह से ये सुनकर मैं दंग थी। प्रियंका बंसल ने इस पूरे वाकये को अपने फ़ेसबुक पर शेयर किया है। ये वही ब्लू व्हेल गेम है, जो कई लोगों की जान ले चुका है। प्रियंका बताती हैं कि उससे पूछा कि क्या वो व्हेल के बारे में बात कर रही है? उसने कहा, व्हेल नहीं ब्लू व्हेल गेम।
 
उसके मुंह से गेम का नाम सुनना, डरावना था
प्रियंका ने अपनी भतीजी को डराने के लिए कहा कि वो इस गेम के बारे में क्यों पूछ रही है? ये गेम तो भूत का है। इतना सुनना था कि उनकी भतीजी ने रोना शुरू कर दिया। बच्ची ने अपने पिता के मोबाइल में गेम डाउनलोड किया था।
 
उसने बताया कि उसकी स्कूल बस के दो 'भइया' ने ये गेम डाउनलोड करने को कहा था। प्रियंका और उनके घरवालों को लगा कि ये सलाह देने वाले बड़ी क्लास के स्टूडेंट होंगे लेकिन बच्ची ने बताया कि वो बच्चे चौथी या पांचवी में पढ़ते हैं।
 
बच्ची इतना डर गई थी कि सिर्फ रो रही थी। बच्ची ने बताया 'उस गेम को खोलने पर व्हेल थी बड़ी सी। उसकी बॉडी में कुछ मास्क जैसा था तो मैं डर गई।' उसके बाद प्रियंका ने वो गेम चेक किया। हालांकि बच्ची बहुत छोटी थी इसलिए शायद इंस्ट्रक्शन समझ नहीं पायी और गेम में आगे की स्टेज पर नहीं बढ़ पायी लेकिन अगर वो वाकई गेम शुरू कर आगे बढ़ जाती तो...
प्रियंका जैसा ही है दूसरी मांओं का डर
लेकिन प्रियंका अकेली नहीं हैं। बहुत सी ऐसी माएं हैं जो इस डर के साए में जी रही हैं। इंदरापुरम में रहने वाली मंजू के दो बच्चे हैं। बेटी की उम्र 9 साल है और बेटे की 17 साल। मंजू का कहना है कि घर में वाई-फ़ाई रखना ज़रूरी है। आजकल एक घर में ही तीन-तीन चार-चार मोबाइल होते हैं।
 
उनकी बच्ची ने तो ख़ैर इस गेम का ज़िक्र अभी तक उनसे नहीं किया है लेकिन उनका बेटा इस बारे में जानता है। उसके मोबाइल में पासवर्ड है इसलिए वो ये नहीं जानतीं कि वो क्या देखता है और उसके मोबाइल में क्या-क्या है।
 
मंजू को डर इस बात का भी है कि छोटे बच्चे को तो फिर भी डर दिखाकर समझाया जा सकता है लेकिन 17 साल के किशोर को कोई कैसे समझाए। उसके साथ तो ज़बरदस्ती नहीं की जा सकती और मोबाइल देना भी मजबूरी है। उन्होंने अपने बेटे से ये ज़रूर कह दिया है कि अगर वो कोई ऐसा गेम डाउनलोड करे तो घर पर ज़रूर बता दे।
 
छोटे बच्चों को समझाना मुश्किल और बड़ों को डराना
शीतल की भी परेशानी कुछ ऐसी ही है। उनकी दो बेटियां हैं। एक दस साल की है और एक सिर्फ़ पांच की। बड़ी बेटी ने स्कूल की वैन में इस गेम के बारे मे सुना। उसने ही शीतल को बताया कि ये गेम कैसे खेलते हैं? इसमें क्या चैलेंज होते हैं और अंत में क्या होता है।

शीतल की बड़ी बेटी जब उन्हें ये सब बता रही थी तो उनकी छोटी बेटी भी वहीं थी। उसके लिए सुसाइड एक नया शब्द था। उसने गेम के बारे में तो बाद में पूछा लेकिन पहले सुसाइड क्या होता है, ये जानना चाहा।
 
शीतल कहती हैं कि पांच साल के बच्चे को ये समझा पाना बहुत मुश्किल है कि सुसाइड क्या है। ऐसे में उन्होंने अपनी दोनों बेटियों से सिर्फ़ ये कहा कि ये बुरा गेम है। मंजू और शीतल जैसी ही परेशानी शशि की भी है। उन्हें भी हर समय ये चिंता रहती है कि उनके बच्चे मोबाइल पर कहीं कुछ ऐसा तो नहीं देख रहे या कर रहे जो उनके लिए ख़तरनाक हो।
 
मामला सिर्फ ब्लू व्हेल गेम/चैलेंज का नहीं है। इंटरनेट की दुनिया इतनी बड़ी है कि बच्चा क्या कर रहा है, क्या देख रहा है।।।इस पर हर समय नज़र बनाए रखना बहुत मुश्किल है। ऐसे में बच्चे की सुरक्षा को हमेशा ख़तरा बना रहता।
 
शशि बताती हैं उनका बेटे ने अभी बारहवीं पास की है। कॉलेज जाता है। टीनएजर्स पर सबसे अधिक पीयर प्रेशर होता है। ऐसे में कई बार वो सही ग़लत जज ही नहीं कर पाते। बच्चों के हाथ में मोबाइल है और मोबाइल में पासवर्ड। ऐसे में वो क्या कर रहे हैं क्या देख रहे हैं कुछ पता नहीं चलता। उनके बेटे ने भी उनसे इस गेम के बारे में बात की थी। लेकिन वो अभी तक इससे दूर है।
 
क्या है ब्लू व्हेल चैलेंज?
मोबाइल, लैपटॉप या डेस्कटॉप पर खेले जानेवाले इस गेम में प्रतियोगियों को 50 दिनों में 50 अलग-अलग टास्क पूरे करने होते हैं और हर एक टास्क के बाद अपने हाथ पर एक निशान बनाना होता है। इस खेल का आख़िरी टास्क आत्महत्या होता है।
 
ब्लू व्हेल चैलेंज से कैसे निपटें?
औरंगाबाद की मनोचिकित्सक मधुरा अन्वीकर कहती हैं, "मोबाइल गेम खेलते समय बच्चों को आनंद महसूस होता है। इससे दिमाग़ के कुछ हिस्से में इस अनुभव को बार-बार लेने की चाह पैदा होती है।"
 
मधुरा कहती हैं, "इस तरह के गेम मे जो भी टास्क दिए जाते हैं, उससे खेलने वाले की उत्सुकता बढ़ने के साथ ही यह भावना भी पैदा होती है कि 'मैं यह करके दिखाऊंगा'। उसे यह पता ही नहीं होता कि उसका अंजाम क्या होगा।"
 
Show comments

जरूर पढ़ें

ये हैं 2026 के Top 7 सबसे प्रैक्टिकल और पैसा वसूल Electric Scooters

सस्ती इलेक्ट्रिक बाइक RVX, 160KM रेंज, 90kmph टॉप स्पीड और फास्ट चार्जिंग के साथ आई

पेट्रोल-डीजल के दाम कब घटेंगे? केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया पूरा गणित

दिल्ली में आतंकी हमले की साजिश नाकाम, ISI से जुड़े 4 आतंकी गिरफ्तार

PM Modi ने सनाए तकाइची को बताया 'छोटी बहन', भारत-जापान के बीच AI और सेमीकंडक्टर समेत कई बड़े समझौते

सभी देखें

मोबाइल मेनिया

25,000 से कम कीमत वाले स्मार्टफोन होंगे सस्ते, GSTघटाकर 5% करने की सिफारिश

OnePlus Nord N6 5G लॉन्च, 19,999 रुपए में 8,000mAh बैटरी, 120Hz डिस्प्ले और 50MP कैमरा

Nothing Phone (3): ट्रांसपेरेंट डिजाइन और धांसू AI फीचर्स के साथ आ रहा है नथिंग का नया स्मार्टफोन, लीक हुई भारत में कीमत!

जून 2026 के 3 सस्ते स्मार्टफोन्स, 7000mAh बैटरी और गेमिंग परफॉर्मेंस का जबरदस्त कॉम्बो

Honor करने वाला है धमाका, आने वाला है 10,000mAh बैटरी और 10,000 Nits ब्राइटनेस वाला सस्ता स्मार्टफोन

अगला लेख