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अमरनाथ यात्रियों और मुसलमानों के बीच है भावनात्मक रिश्ता

Webdunia
बुधवार, 12 जुलाई 2017 (11:21 IST)
- माजिद जहांगीर (श्रीनगर से)
भारत-प्रशासित कश्मीर में अमरनाथ यात्रियों और स्थानीय मुसलमानों के बीच प्यार और भावनाओं का एक गहरा रिश्ता रहा है। इतिहास पर नज़र डालें तो स्थानीय मुसलमानों और यात्रियों को हमेशा से एक-दूसरे की ज़रूरत रही है। इस रिश्ते में आज भी गर्मजोशी दिखती है।

सोमवार को एक चरमपंथी हमले में सात अमरनाथ यात्रियों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। अमरनाथ यात्रा की बात करें, तो श्रीनगर से क़रीब 150 किलोमीटर दूर स्थित अमरनाथ गुफा के दर्शन के लिए हर सालों लाखों यात्री पहुंचते हैं।
 
यादें
गुलाम हसन मलिक गांवों के नंबरदार है। उनकी उम्र 60 वर्ष हो गई है। मलिक उस परिवार की सातवीं पीढ़ी से हैं, जिन्होंने अमरनाथ गुफा को खोजा था। अमरनाथ गुफा की खोज करीब पांच सौ बरस पहले बुटे मलिक ने की थी। वो साल 1970 से अमरनाथ यात्रा के साथ जुड़े हैं।
 
गुजरे वक़्त से आज की तुलना करते हुए वो कहते हैं, "हम आज भी उसी तरह अमरनाथ गुफ़ा जाने वाले यात्रियों की सेवा करना चाहते हैं, जिस तरह पहले किया करते थे।" भारत प्रशासित कश्मीर के पहलगाम में बटकोट के रहने वाले गुलाम हसन मलिक कहते हैं, "एक वो ज़माना था जब अमरनाथ गुफ़ा जाने वाले पैदल हमारे गांवों तक पहुंच जाते थे और यहां वे ठहरते थे और हम उन्हें कहवा पिलाते थे। गांवों की सभी महिलाएं, बूढ़े और बच्चे यात्रियों को देखने बाहर आते थे। उनके लिए कश्मीरी गाने गाते थे।"
 
वो आगे कहते हैं, "हम यात्रियों को बड़े शौक़ से अपने घरों में बुलाते थे और उनको गुफा तक भी पहुंचाते थे। यात्री गुफा का दर्शन करने के बाद फिर हमारे घरों में आते थे। फिर इजाज़त लेके जाते थे, ऐसा माहौल था। महिलाएं एक दिन पहले छड़ी देखने की तैयारी करती थीं। अंधेरे में सड़कों पर निकलते और यात्रियों को टाटा, बाय-बाय करते।"
 
कश्मीर के मुसलमानों और अमरनाथ यात्रियों के इतिहास पर बात करते हुए मलिक कहते हैं, "जब यहां से यात्रा चलती थी तो उस समय न ही कोई ज़ात होती थी, ना ही कोई रंग, मुसलमान, हिंदू धर्म एक जैसा था। सब मानते थे कि ये पवित्र गुफा है। हमें हर साल हाडपूना और शावरपूणा पर पूछा जाता था कि छड़ी मुबारक कब निकलेगी और किस पड़ाव पर जाएगी।"
गुलाम मलिक बड़ी हसरत से कहते हैं, "हम चाहते हैं कि हम फिर अपने हिंदू भाइयों के पीछे-पीछे चले, हमें पैसे नहीं चाहिए।"
 
आमदनी
बटकोट के मलिक ख़ानदान को वर्ष 2002 तक अमरनाथ गुफा में यात्रियों से होने वाली आमदनी का एक तिहाई हिस्सा मिलता था।

गुलाम हसन कहते हैं, "वर्ष 2002 में जब अमरनाथ श्राइन बोर्ड बना तो हमें यानि मलिक ख़ानदान को यात्रा की सभी गतिविधियों से अलग कर दिया गया। हमसे कहा गया कि जब आपके मुस्लिम वक़्फ़ बोर्ड में कोई हिंदू नहीं है तो श्राइन बोर्ड में मुसलमान कैसे हो सकता है। मुझे लगता है कि वो मुसलमानों और हिंदुओं में दूरियां डालना चाहते थे।"
 
मलिक परिवार के एक अन्य सदस्य मलिक अफ़ज़ल कहते हैं कि उन्होंने अपने दादा, परदादा और खानदान के बुजुर्गों से सुना है कि किस तरह एक दिन भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए थे। वे कहते हैं, "जो अमरनाथ गुफ़ा का पहला कच्चा रास्ता था, वह तो बुटे मलिक ने ही बनाया था। हमारे खानदान ने हमेशा गुफ़ा को पवित्र जगह माना है। हम हर साल वहां जाते हैं और यात्रियों के लिए दवाओं का मुफ्त कैंप लगाते हैं। मेरे घर आज भी यात्री मिलने आते हैं। यात्रियों की वजह से हमें काफ़ी फ़ायदा पहुँचा है। यहां के घोड़े वालों, टेंट वालों और गाड़ी वालों की रोज़ी-रोटी उनसे चलती है।"
 
कारोबार
पहलगाम में हज़ारों लोग अमरनाथ यात्रियों के साथ करोबारी स्तर पर जुड़े हैं। मलिक अफ़ज़ल बीते सोमवार को अनंतनाग में अमरनाथ यात्रियों पर हुए हमले की निंदा करते हुए कहते हैं, "जिन्होंने भी उनको मार डाला, वो इंसान नहीं, हैवान हैं।" अनंतनाग में यात्रियों की एक बस पर हुए हमले में सात लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए।
 
गुलाम हसन बताते हैं कि पहले छड़ी श्रीनगर, अवंतीपुरा, बिजबिहाड़ा, अंदरनाग, बटकोट और दूसरी जगहों पर रोकी जाती थी। अब छड़ी को सिर्फ़ श्रीनगर, मटन, पहलगाम और चंदनवारी में रोका जाता है। पहलगाम के 52 वर्ष के एक दुकानदार गुल मुहम्मद कहते हैं कि यात्रियों को जब भी परेशानी आती है तो हम उसको दूर करने की कोशिश करते हैं।
 
वे कहते हैं, "किसी भी यात्री को अगर होटल तलाश करने में परेशानी होती है तो हम उनके साथ जाते हैं और परेशानी दूर करवाते हैं। यात्री भी हमारे पास आते हैं। सामान खरीदते हैं जिससे हमारी रोज़ी रोटी चलती है।"
 
हावड़ा से आए एक यात्री बुरकट बीते दस वर्षों से अमरनाथ यात्रा पर आते हैं। वो कहते हैं कि हर समाज में कुछ लोग खराब होते हैं। वे कहते हैं कि कश्मीरी लोग अच्छे हैं। वे ये भी कहते हैं कि जब कभी वे घोड़े से गिरते हैं तो कश्मीरी घोड़े वाला ही उन्हें उठाता है।
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