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पौष मास के रविवार व्रत से होती हैं समस्त मनोकामनाएं पूर्ण

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* रविवार व्रत से पाएं भगवान सूर्यदेव की कृपा
 
पौष का महीना प्रचंड शीत ऋतु का होता है। इस महीने सूर्य की उपासना वह भी विशेष कर रविवार को करने से उपासक का तन-मन और भाव तीनों की शुद्धता हो जाती है। 
 
पौष माह के रविवार को ऐसे करें पूजन :- 
 
* पौष के रविवार को सूर्य की उपासना के लिए सूर्योदय से पहले जागना चाहिए। 
 
* स्नान एवं वंदन के बाद तांबे के कलश अथवा किसी भी धातु के पात्र में जल भरकर उसमें रोली, अक्षत और लाल रंग के फूलों को डालकर इस प्रकार से अर्घ्य देना चाहिए कि जल की धारा के बीच से उगते हुए सूर्य का दर्शन करना चाहिए। 
 
* दिनभर व्रत रखकर सायंकाल अग्निहोत्र आदि कर बिना नमक का भोजन करना चाहिए। 
 
* इस प्रकार इस महीने प्रत्येक रविवार को सूर्य की उपासना करने से दैविक, दैहिक और भौतिक तीनों कष्टों से छुटकारा मिल जाता है। उपासक की बुद्धि सूर्य के प्रकाश की तरह प्रखर हो जाती है। 
 
भारतीय उपासना पद्धति बड़ी विराट एवं मनोवैज्ञानिक है। इसमें तिथि, वार, नक्षत्र, संक्रांति के साथ-साथ हर महीने अलग-अलग देवी-देवताओं की उपासना से जुड़े हुए हैं। वस्तुतः चराचर के प्रकाशक देवता होने से सूर्य को सविता कहते हैं। गायत्री मंत्र इसी 'सविता' की उपासना का मंत्र है। साक्षात्‌ सृष्टिकर्ता विधाता जो न केवल पृथ्वी, अंतरिक्ष और द्युलोक को प्रकाशित करते हैं अपितु चराचर जगत्‌ को नियंत्रित भी करते हैं।

समस्त देवताओं के मुखिया भगवान भास्कर अपने धाता स्वरूप से संपूर्ण जगत को धारण करने तथा सबको कर्म जगत में प्रेरित करने के लिए वंदनीय हैं।  जगत की समस्त घटनाएं तो सूर्य देव की ही लीला विलास हैं। एक ओर जहां भगवान सूर्य अपनी कर्म सृष्टि सर्जना की लीला से प्रातः काल में जगत को संजीवनी प्रदान कर प्रफुल्लित करते हैं तो वहीं दूसरी ओर मध्या-काल में स्वयं ही अपने महेश्वर स्वरूप से तमोगुणी लीला करते हैं। मध्या-काल में आप अपनी ही प्रचंड रश्मियों के द्वारा शिवरूप से संपूर्ण दैनिक कर्म सृष्टि की रजोगुण रूपी कालिमा का शोषण करते हैं। 
 
जिस प्रकार परमात्मा अपनी ही बनाई सृष्टि का आवश्यकतानुसार यथा समय अपने में ही विलय करता है। ठीक उसी प्रकार भगवान आदित्य मध्या-काल में अपनी ही रश्मियों द्वारा महेश्वर रूप में दैनिक सृष्टि के विकारों को शोषित कर कर्म जगत को हष्ट पुष्ट स्वस्थ और निरोग बनाते हैं। जगत कल्याण के लिए भगवान सूर्य की यह दैनिक विकार शोषण की लीला ही भगवान नीलकण्ठ के हलाहल पान का प्रतीक है। 

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