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छठ पर्व : लोक संस्कृति का सौभाग्य उत्सव

Webdunia
- आचार्य गोविंद बल्लभ जोशी

ॐ नमो भगवते भुवन भास्कराय
 
दिल्ली में छठ पर्व का नजारा निराला ही होता है।  बिहार एवं पूर्वी उत्तर के लोगों द्वारा पूरी तन्मयता एवं श्रद्धा भक्ति से यह पर्व मनाया जाता है। साथ ही दिल्ली के अनेक समुदायों के लोग इस उत्सव में अपनी उपस्थिति दर्ज करते हैं।
 
23 अक्टूबर को पवित्र सरोवरों में स्नान के साथ ही छठ पर्व का संकल्प किया गया। प्रातःकाल ही श्रद्धालुओं ने गंगा-यमुना आदि पवित्र नदियों का स्मरण, सात समुद्रों, सप्तद्वीप वसुंधरा के पवित्र तीर्थों का स्मरण पितरों, पूर्वजों एवं देवताओं का स्मरण करते हुए मंत्रोच्चारण के साथ स्नान किया।
 
पूरी शुद्धता के साथ छठ पूजन के लिए ठेकवा, खाजा आदि भोग पदार्थों का निर्माण किया। प्रकृति दत्त वस्तुएं जैसे- गन्ना, नींबू, मूली, सिंगाड़े, सेब, केले आदि फल प्रसाद से भरी बांस की टोकरी में सजाकर सायं काल अस्ताचल को जाते सूर्य को अर्घ्य देते समय नैवेद्य रूप में पूजा स्थान पर स्थापित होगी। साथ ही छाज में सिंदूर, चावल, पान, सुपारी, हल्दी, नारियल आदि रखकर उसे हाथों में लिए जल की धारा में खड़े होकर विधि-विधान से पूजा की जाएगी।
 
इस अवसर पर जहां वैदिक एवं पौराणिक मंत्रों से पूजन का विधान है, वहीं श्रद्धा भक्ति से लोक-रीति के मंगलगीतों के मध्य सूर्य नारायण को अर्घ्य दान तथा छठी माई की पूजा का विशेष उल्लास माहौल में घुल गया है।
 
नौजवान, बच्चे खुशी में झूमते हुए फुलझड़ियों एवं पटाखा आदि से आतिशबाजी कर प्रकृति की इस उपासना का भव्य स्वागत करते हैं। इसी क्रम में इस दिन अस्ताचलगामी सूर्य की आराधना कर रात्रि के प्रथम प्रहर में श्रद्धालु अपने घरों को लौट जाएँगे लेकिन विशिष्ट आराधना से अपने जोड़े रखने वाले कुछ साधक सारी रात्रि पवित्र नदियों के घाटों पर जप-तप आराधना भी करते हैं।
 
राजधानी दिल्ली में ऐसे उपासकों की संख्या अल्प ही होती है लेकिन जो इस साधना के द्वारा छटी माई की पूजा करते हैं। वहीं दूसरे दिन उदय होते सूर्य को अर्घ्य देकर ही उस स्थान से वापस आते हैं। 
 
उदय होते सूरज के साथ पारणा- पूजन सामग्री एवं फल प्रसाद के साथ छठ पूजा घाटों में उदय होते सूर्यनारायण को विशेष अर्घ्य देने के साथ छठ पर्व का पारायण (पारणा) होता है।
 
इस दिन श्रद्धालु परिवार सहित प्रातः 3 बजे के आसपास पूजास्थल (घाटों) पर एकत्रित होकर पारणा की उत्तरांग पूजा क्रम प्रारंभ कर देते हैं जिसमें विशेषकर जल की निर्मल धारा में खड़े होकर सूर्योपास होती है। जैसे ही अरूणोदय होने लगता है श्रद्धालु कहने लगते हैं कि भगवान सूर्य की सवारी आने लग गई है।
 
पूर्व दिशा में सूर्योदय से पूर्व की लालिमा का पूजन ऊषाकाल पूजन कहलाता है। जब सूर्य अपनी बालक रूपी प्रथम किरणों के साथ उदयाचल में प्रकट होने लगते हैं तब जलधारा में जोड़ों में खड़े उपासक सूर्य को अर्घ्य प्रदान करते हुए सुख-समृद्धि की प्रार्थना करते हैं। आरती पूजन पुष्पांजलि के मनोरम वातावरण को देख ऐसा लगता है प्रकृति उपासना का यह क्रम आज भी जीवंत है।
 
इस उपासना की पावन धारा सनातन रूप से सदैव प्रवाहित होती रहेगी। राजधानी के शहरी और ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में छठ पूजा लोग बड़े उत्साह से मनाते हैं।
 

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