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चौंकाने वाला खुलासा! साधुओं को इस तरह नपुंसक बनाता था राम रहीम...

Webdunia
बुधवार, 6 सितम्बर 2017 (13:02 IST)
सिरसा। वर्षों तक देश-प्रदेश में सूफी गायकी से डेरा सच्चा सौदा की शान में कसीदे पढ़ने वाले हकीक हंस को मलाल है कि डेरा प्रमुख ने उसे और उसके जैसे लगभग 500 साधुओं को परमात्मा की प्राप्ति और भक्तिमार्ग में मन लगाने का झांसा देकर नपुंसक बना दिया और वे अब कहीं के नहीं रहे।
 
हकीक हंस का असली नाम हंसराज चौहान है, जिसने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में डेरा प्रमुख के खिलाफ डेरा में रहने वाले लगभग 500 साधुओं को नपुंसक बनाने का आरोप लगाते हुए मामला दायर कर रखा है जिसकी अगली सुनवाई 25 अक्टूबर को होनी है।
 
हंस का मानना है कि साध्वी यौन शौषण मामले में फैसला आने के बाद उसे भी न्याय मिलेगा। उसको इसके साथ ही अपनी जान का पहले से ज्यादा खतरा मंडराता दिखाई दे रहा है। उसका कहना है कि मुकदमे में शिकायतकर्ता और अनेक घटनाओं का प्रत्यक्षदर्शी और गवाह होने पर डेरा प्रमुख जेल में रहते हुए भी किसी भाड़े के गुर्गे से उसकी हत्या करा सकते हैं।
 
हंस ने बातचीत में यह भी रहस्योद्घाटन किया है कि अदालत या प्रशासन डेरा की जांच कराए तो डेरा से अनेक साधुओं और युवतियों के कंकाल मिल सकते हैं जिन्हें डेरा की बात नहीं मानने या विरोध करने पर मरवा दिया गया। ऐसे लोगों को ठिकाने लगाने का काम कथित तौर पर डेरा प्रमुख की एमएसएफ यानी मन सुधार फोर्स करती थी। 
 
टोहाना के डेरा अनुयायी पुरुषोत्तम और सतपाल सैनी की प्ररेणा से डेरा की राह देखने वाले 16 वर्षीय युवक हंसराज ने अपनी सूफी गायकी से डेरा प्रमुख का ऐसा मन जीता कि वह 1996 में स्वयं उसके टोहाना स्थित घर पहुंचे और माता बस्सो और पिता बल्लू राम से साधु बनाने के नाम पर उसे मांगा, लेकिन परिजनों ने साफ इंकार कर दिया। 
 
हंस का कहना है कि दबाव बनाने के लिए उसने पुरुषोत्तम और सतपाल के कहने पर जहरीला पदार्थ निगल लेने का ड्रामा किया जिस पर उसके परिजन उसे डेरा भेजने पर राजी हो गए। इसके बाद उसने शादी के लिए पंजाब की मुनक तहसील के चांदू गांव में किया गया रिश्ता भी तोड़ दिया। 
       
उसने बताया कि डेरा के साथ अधिकाधिक लोगों को जोड़ने के लिए उसने हिमाचल के छछिया से डेरा प्रमुख का यशगान करना शुरू किया और बाद में कई अन्य राज्यों में गाता रहा। उसके सूफिया कलाम से प्रभावित होकर डेरा प्रमुख ने उसे 15 जनवरी 1996 को उसे साधु का दर्जा देते हुए डेरा की भजन मंडली में शामिल कर लिया और उस पर बाहरी गाने सुनने, टेलीविज़न देखने, अखबार और काव्य संग्रह पढ़ने तथा बाजारी खानपान की पाबंदी लगा दी।
 
हंस के अनुसार इस दौरान उसकी मुलाकात डेरा प्रमुख के विश्वस्त मोहनसिंह और दर्शनसिंह से हुई जो डेरा के साधुओं को नंपुसक बनाने के लिए प्रेरित करते थे। लगभग 250 साधुओं को डेरा प्रमुख के पैतृक गांव गुरुसर मोडिया अस्पताल ले जाकर नंपुसक बनाया गया। नपुंसक बनाए जाने से पूर्व साधुओं को काले रंग की एक गोली और कुछ रसपान दिया जाता था जिससे वे बेहोश हो जाते और ऑपरेशन का दर्द नहीं होता था। (वार्ता)

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