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उत्तर प्रदेश चुनाव: पश्चिमी यूपी के घमासान में विभिन्न दलों की आख़िर क्या है रणनीति

BBC Hindi
शुक्रवार, 28 जनवरी 2022 (07:36 IST)
वात्सल्य राय, बीबीसी संवाददाता

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के पहले दौर के मतदान का समय क़रीब आ रहा है और चुनाव प्रचार अब तेज़ी पकड़ने लगा है। पहले चरण में पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 58 सीटों पर वोट डाले जाने हैं। मतदान 10 फ़रवरी को होना है।
 
सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी दलों के बड़े नेताओं ने अब अपना पूरा ध्यान पश्चिमी यूपी पर ही लगा दिया है। इसके साथ ही ये समझने की कोशिश हो रही है कि किस पार्टी का पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लिए क्या गेम-प्लान है?
 
बीजेपी के कई नेता जैसे केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और सीएम योगी आदित्यनाथ गुरुवार को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलग-अलग ज़िलों के दौरे पर थे। उन्होंने वहां मंदिर और क़ानून-व्यवस्था के मुद्दे उठाए।
 
उधर समाजवादी पार्टी के साथ गठजोड़ करने वाले राष्ट्रीय लोकदल के नेता चौधरी जयंत सिंह ने बीजेपी के साथ आने की संभावना ख़ारिज कर दी है।
 
कैसा चल रहा बीजेपी का प्रचार अभियान?
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले हफ़्ते कैराना जाकर घर-घर लोगों से मिलकर अपनी पार्टी का प्रचार किया था। गुरुवार को वे पश्चिमी यूपी के वृंदावन के दौरे पर थे।
 
अमित शाह यहां भी घर-घर जाकर लोगों से मिले, लेकिन लोगों से मिलने के पहले बांके बिहारी मंदिर में दर्शन किए और कार्यकर्ताओं की बैठक में राम मंदिर का ज़िक्र किया।
 
अमित शाह ने कहा कि 'मोदी जी की सरकार रहने के चलते ही अयोध्या में मंदिर का निर्माण शुरू हुआ है'। उन्होंने कार्यकर्ताओं की राय लेते हुए पूछा कि 'क्या मोदी जी की सरकार न होती तो काशी में बाबा विश्वनाथ का कॉरिडोर बनता क्या'। यह भी पूछा कि 'विंध्यवासिनी माता के मंदिर का कॉरिडोर बनता क्या'।
 
अखिलेश यादव पर व्यंग्य करते हुए उन्होंने कहा कि अखिलेश जी हमेशा कहते थे कि मंदिर वहीं बनाएंगे, पर तिथि नहीं बताएंगे।
 
उन्होंने कश्मीर में अनुच्छेद 370 ख़त्म करने का मामला भी उठाते हुए कहा कि यह मांग 70 साल पुरानी थी, लेकिन तभी पूरी हुई जब मोदी जी की सरकार बनी।
 
अमित शाह ने समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव से क़ानून व्यवस्था पर भी सवाल किया। उन्होंने कहा कि जब क़ानून के मुताबिक़ कार्रवाई होती है, तो तकलीफ़ सपा को होती है।
 
उन्होंने आरोप लगाया कि पांच साल पहले जब अखिलेश यादव की सरकार थी तो राज्य में गुंडाराज था, बाहुबली लोगों को तंग करते थे, महिलाओं का अपमान होता था। लेकिन जब से बीजेपी की सरकार राज्य में आई तो जिन बाहुबलियों से पुलिस डरती थी, अब वे पुलिस से डर रहे हैं और सरेंडर कर रहे हैं।
 
अमित शाह ने आरोप लगाया कि जब इन बाहुबलियों पर कार्रवाई होती है तो अखिलेश जी के पेट में दर्द होता है। कहीं आज़म ख़ान तो कहीं मुख़्तार अंसारी, न जाने कितनों को सपा ने शरण दे रखी थी।
 
अमित शाह ने विकास की बात भी की और दावा किया कि सबसे बड़ा राज्य होने के चलते यूपी का चुनाव भारत के भाग्य का निर्णय करेगा।
 
उधर, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी गुरुवार को पश्चिम उत्तर प्रदेश के दौरे पर थे। उन्होंने अपनी सरकारों के काम गिनाने के साथ अखिलेश यादव की पूर्व सरकार को कठघरे में खड़ा किया।
 
उन्होंने कहा, ''अब राज्य में हिंदू पर्व त्यौहार धूमधाम से मनाए जा रहे हैं, जबकि सपा की सरकार में कांवड़ यात्रा पर रोक लग जाती थी। मैंने तो सरकारी हेलिकॉप्टर से कांवड़ियों पर फूल बरसाए। उनकी सरकार के समय रामभक्तों पर गोलियां चलाई जाती थीं।''
 
मंदिर की बात रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी की। वो गुरुवार को दिल्ली से सटे ग़ाज़ियाबाद ज़िले में थे, लेकिन उनका अंदाज़ कुछ अलग था।
 
राजनाथ सिंह ने कहा, ''लोग कहते हैं कि आप लोग हमेशा मंदिर की बातें करते हैं, लेकिन और क्या कर रहे हैं। यदि पुरानी विरासत ख़त्म होनी चाहिए तो भारत की संसद भी अंग्रेज़ों द्वारा बनवाई गई है। उसके स्थान पर हम लोकतंत्र का नया मंदिर भी बना रहे हैं। सब कुछ नए रूप में देखना चाहते हैं।''
 
जयंत चौधरी ने क्या कहा?
इससे पहले अमित शाह ने बुधवार को दिल्ली में जाट नेताओं के साथ मुलाक़ात की थी। इस दौरान राष्ट्रीय लोकदल नेता चौधरी जयंत सिंह का भी ज़िक्र हुआ। जयंत ने इस बार अखिलेश यादव की सपा के साथ हाथ मिलाया है।
 
बीजेपी नेताओं ने जयंत चौधरी के लिए दरवाज़े खुले होने की बात भी कही। हालांकि जयंत ने बुधवार को ही ट्वीट करके बीजेपी के न्योते को ख़ारिज़ कर दिया।
 
जयंत चौधरी ने गुरुवार को भी एक कार्यक्रम में सपा के साथ गठबंधन पर कहा कि 'वे कोई चवन्नी नहीं हैं जो कि पलट जाएं'।
 
उन्होंने आगे कहा, ''भाईचारे से किसको एलर्जी है। लेकिन बीजेपी के नेता उस समय कहां थे जब किसानों को कुचला गया था। वो आज भी मंत्री बनकर बैठे हैं। सपा के साथ चुनाव लड़ने का फ़ैसला सोच समझकर किया गया है। लोग उन्हें हल्के में न लें।''
 
उन्होंने आरोप लगाया कि उनसे हमदर्दी जताना बीजेपी का चुनावी पैंतरा है, जबकि सच तो यही है कि बीजेपी को उनसे ज़्यादा दिली लगाव नहीं है। उन्होंने दावा किया कि बीजेपी की हालत राज्य में खस्ता है, इसलिए अपने खिसके वोटों को साथ लेने के लिए उनसे सहानुभूति जताई जा रही है।
 
ज़ाहिर है, हर दल और हर गठबंधन फ़िलहाल अपने क़दम अपनी रणनीति के मुताबिक़ ही बढ़ा रहा है। लेकिन वोटरों तक किसके संदेश किस रूप में पहुंचते हैं और सियासी हवा का रुख़ कितना मोड़ पाते हैं, ये तो 10 मार्च को ही साफ़ होगा।
 
वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त ​त्रिपाठी का आकलन
उत्तर प्रदेश में सालों से रिपोर्टिंग कर रहे वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त ​त्रिपाठी ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मौजूदा रुझान को लेकर बीबीसी से बातचीत की।
 
रामदत्त त्रिपाठी से जब पूछा गया कि पश्चिमी यूपी में चुनाव का रुख़ आख़िर किस ओर जा रहा है तो उन्होंने कहा, ''पश्चिमी यूपी में तिकोना मुक़ाबला है। वैसे तो पूरे राज्य में बीजेपी और सपा के बीच मुक़ाबला बताया जा रहा है, लेकिन इस इलाक़े में मायावती को कम करके नहीं आंकना चाहिए। बसपा ने यहां जो प्रत्याशी उतारे हैं, उसे देखकर ऐसा लगता है कि उनका निशाना बीजेपी नहीं सपा है।''
 
रामदत्त त्रिपाठी के अनुसार, पिछले बार पश्चिमी यूपी में मुज़फ़्फ़रनगर दंगों के कारणा बड़ी सफलता मिली थी, लेकिन इस बार वहां बीजेपी की हालत अच्छी नहीं है। बीजेपी के नेताओं और मंत्रियों का विरोध देखा जा रहा है। इसकी वजह किसान आंदोलन और उसके प्रति सरकार का व्यवहार भी है। किसानों को गन्ने के दाम ठीक से नहीं मिले।''
 
उन्होंने कहा कि बीजेपी पर जाटों की नाराज़गी भारी पड़ रही है, इसलिए बीजेपी उनकी नाराज़गी दूर करने की कोशिश में लगी है। उनके अनुसार, बीजेपी यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि चुनाव हो भी जाएं तो बाद में वे जयंत चौधरी को पटा लेंगे। ये उनका एक दांव है।
 
जयंत चौधरी के बारे में उन्होंने कहा कि उनसे पहले बात हुई होगी लेकिन पश्चिमी यूपी का जो माहौल है, उसमें बीजेपी के साथ उनके चले जाने पर भी जाट बीजेपी के साथ नहीं जाते। उनके अनुसार, लोगों में सरकार को लेकर नाराज़गी है और इस बात को जयंत चौधरी अच्छी तरह भांप चुके हैं।
 
रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, ''बीजेपी का गणित ये है कि यदि किसी को बहुमत न मिला तो उसकी तैयारी बीजेपी ने अभी से शुरू कर दी है। वैसी हालत में बीजेपी की निगाहें जयंत चौधरी पर भी हैं और मायावती पर भी।
 
साथ ही बीजेपी समाज में ये संदेश नहीं देना चाहती कि जयंत चौधरी से कोई कटुता है क्योंकि उस इलाक़े में जयंत चौधरी और उनके दादा चौधरी चरण सिंह का काफ़ी सम्मान है।
 
जयंत चौधरी पहली बार बीजेपी के सहयोग से ही सांसद बने थे, बीजेपी लोगों को इसकी याद दिला रही है। इसके बारे में रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं कि चौधरी चरण सिंह और उनके बेटे अजीत सिंह कई बार पाला बदलते रहे हैं, इसलिए बीजेपी इस बात को लोगों को याद दिलाकर ये संकेत देना चाहती है कि बाद में जयंत भी उनके साथ आ सकते हैं।

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